*आख़िर असली मुजरिम कौन-निर्माण माफ़िया या शिकायतकर्ता?*
*जाँच की दिशा या ध्यान भटकाने की कोशिश?*
वाह भाई वाह, लखनऊ विकास प्राधिकरण का अजब ही खेल निराला है! शहरभर में अवैध इमारतों की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी हो जाए, तब तो इन साहबों की नींद नहीं खुलती, लेकिन जैसे ही कोई आईजीआरएस पर उंगली उठा दे, वैसे ही महकमे में भूचाल आ जाता है। अब एलडीए ने उन टॉप 50 शिकायतकर्ताओं की सूची सीधे विजिलेंस को थमा दी है जो अवैध निर्माणों की पोल खोल रहे थे। वाह रे प्रशासनिक ईमानदारी! मतलब चोर को पकड़ने के बजाय चोर की शिकायत करने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर दो, ताकि भ्रष्टाचार की इस गर्म रोटी पर मजे से हाथ सेका जा सके।
हद तो यह है कि विभाग खुद इस बात की गवाही दे रहा है कि शिकायतों के नाम पर वसूली और ब्लैकमेलिंग का धंधा चल रहा है। अरे साहब, तो वह बिना आपकी तगड़ी मिलीभगत के संभव कैसे हो जाता? क्या आपके इंजीनियर और जोनल अफसर वहां चूड़ियां पहनकर बैठे थे? रिश्वत के इस खेल में लेने वाला और देने वाला दोनों बराबर के पापी होते हैं, तो फिर सिर्फ शिकायतकर्ताओं और छोटे-मोटे कर्मचारियों पर ही गाज क्यों गिर रही है? असल मास्टरमाइंड तो विकास प्राधिकरण के वे बड़े अधिकारी और कुर्सी पर बैठे महारथी हैं, जिनकी छत्रछाया में यह पूरा अवैध साम्राज्य फल-फूल रहा है।
विजिलेंस अधिकारी से जनता की सीधी गुहार है कि सिर्फ उन 50 लिखित शिकायतकर्ताओं की ही नहीं, बल्कि जोनल अधिकारियों एंव अपर सचिव और सचिव के कमरों के बाहर मंडराने वाले उन खास बाहरी व्यक्तियों और बिचौलियों की भी गहन जांच होनी चाहिए, जिन्हें बिल्डरों का आंका कहा जाता है। जोनल अधिकारी और वरिष्ठ अधिकारी खुलेआम इस सिंडिकेट में शामिल हैं और अपने कमरों में बैठकर इस अवैध धंधे से मोटी कमाई कर रहे हैं।
भले ही अभी जांच अपनी शुरुआती स्टेज में है और बिना ठोस सबूत के किसी पर सीधे आरोप लगाना उचित नहीं है, लेकिन बड़े अधिकारियों पर यह मेहरबानी क्यों? विजिलेंस द्वारा जिन जोनल अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, उनकी और वरिष्ठ अधिकारियों की संपत्तियों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन सफेदपोशों और अनजान लोगों की पहचान क्यों छिपाई जा रही है जो रोजाना एलडीए दफ्तर आकर जोनल अधिकारियों के कमरों से मौखिक खेल खेलते हैं और कागजी घोड़े दौड़ाकर मुख्यमंत्री जी के आदेशों व नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं?
लेकिन मजाल है कि इन साहबों की गिरेबान पर किसी का हाथ पहुंच जाए! छोटे-मोटे मोहरों को बलि का बकरा बनाकर बड़े-बड़े घपलेबाजों को बचाने का यह पुराना और घिसा-पिटा हथकंडा अब जनता के सामने बेनकाब हो चुका है। विजिलेंस जांच का ढिंढोरा पीटने से पहले अगर वाकई दम है, तो उन भ्रष्ट अधिकारियों, कमरों के बाहर खड़े रहने वाले बिचौलियों और संपर्कों की पूरी फाइल खोलिए, जिनकी मेहरबानी से शहर में कंक्रीट के अवैध जंगल खड़े हुए हैं। वरना जनता सब अच्छी तरह समझती है कि इस भ्रष्टाचार के खेल में असल खिलाड़ी कौन है और कौन सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाकर अपनी खाल बचाने में जुटा है।









