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वाह रे मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड* *तीन दिन का टेंडर… करोड़ों का काम… क्या ये सामान्य प्रक्रिया हो सकती है? BMFNEWS

*वाह रे मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड*

 

*तीन दिन का टेंडर… करोड़ों का काम… क्या ये सामान्य प्रक्रिया हो सकती है?*

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लखनऊ। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम (एमवीवीएनएल) के *अमौसी जोन में जारी टेंडरों को देखकर एक बड़ा सवाल उठता है* — *करोड़ों रुपये के काम का टेंडर सिर्फ तीन दिन में कैसे निकल सकता है?*

*टेंडर संख्या 43/SE(T)AMAUSI ZONE/2026-27 (आईडी 2026_MVVNL_1172138_2) को 28 जुलाई 2026 को प्रकाशित किया गया। बिड जमा कराने और खोलने की तारीख 31 जुलाई रखी गई। कुल तीन दिन। ईएमडी 2.11 लाख रुपये।*

*अब व्यावहारिक सवाल यह है: तीन दिन के अंदर कोई नई कंपनी बैंक गारंटी कैसे निकलवाएगी?*

*तीन दिन में सारे तकनीकी दस्तावेज, अनुभव प्रमाण-पत्र और अन्य कागजात कैसे तैयार होंगे?*

*12 बजे तक बिड जमा होनी थी और दोपहर 4 बजे तक बिड खुल चुकी थी। इतने कम समय में सही प्रतिस्पर्धा कैसे संभव है?*

*क्या सिर्फ उन्हीं 3-4 कंपनियों को पहले से मालूम था कि टेंडर निकलने वाला है? क्या दस्तावेज पहले से तैयार रखे गए थे? क्या टेंडर उन्हीं के हिसाब से डिज़ाइन किया गया हो सकता है? वरना तीन दिन में इतने कागजात कैसे लग जाते बिड ओपनिंग में भी सवाल*

*31 जुलाई को तकनीकी बिड खोली गई*। *सिस्टम में दो बिड ओपनर दर्ज हैं* — *ब्रह्म पाल (04:01 बजे) और राहुल यादव (04:15 बजे)। दोनों के बीच 14 मिनट का अंतर है। अंतिम डिजिटल सिग्नेचर सिर्फ राहुल यादव का है। अधीक्षण अभियंता (तकनीकी) का नाम या सिग्नेचर इस ओपनिंग दस्तावेज में कहीं नहीं दिखता।*

*क्या अधीक्षण अभियंता की जिम्मेदारी यह नहीं है कि वह निविदा अपने सामने खुलवाए?* *क्या इतने महत्वपूर्ण टेंडर की ओपनिंग में उनका कोई निशान न होना सिर्फ सामान्य बात है? या फिर यह लापरवाही (या उससे आगे की किसी बात) का संकेत हो सकता है? दस्तावेज में उनका नाम तक न होना — क्या यह बेकार की चिंता का विषय नहीं है?*

*रिटेंडर का सिलसिला*

*इस टेंडर को दो बार रिटेंडर किया गया। एक बार गलत बीओक्यू का हवाला देकर*, *दूसरी बार प्रशासनिक कारण बताते हुए* *फिर नया टेंडर शुरू कर दिया गया। क्या बार-बार रिटेंडर से कुछ खास कंपनियों को ही फायदा पहुँचाने की कोशिश हो सकती है?*

अन्य टेंडरों में भी वही पैटर्न

*अमौसी जोन के टेंडर नंबर 38 और 40 तथा सेंट्रल जोन के टेंडर 14 में भी शॉर्ट-नोटिस, एक्सटेंशन और सीमित कंपनियों की भागीदारी दिख रही है।* कुछ कंपनियाँ बार-बार इन टेंडरों में आ रही हैं। एक ठेकेदार फर्म ने रिजेक्शन का कारण माँगते हुए पत्र लिखा है। *क्या पूरे जोन में एक जैसा रुझान चल रहा है?*

*अधिकारियों की प्रतिक्रिया*

*जब इस मामले में कुछ अधिकारियों से बात की गई तो जवाब मिले —अभी कुछ पता नहीं* *जोन की बात मुख्य अभियंता से करें*”, *मैं मध्यांचल देखता हूँ*”। *क्या ऊपर से नीचे तक कोई ठोस जवाब नहीं मिलना अपने आप में बड़ा प्रश्नचिह्न नहीं है?* *क्या कई स्तरों के अधिकारी इसमें शामिल हो सकते हैं?* *यह सिर्फ संभावना है, लेकिन सवाल तो लग ही रहा है।*

कुल मिलाकर

*तीन दिन में करोड़ों का टेंडर… बैंक गारंटी… पूरे दस्तावेज… सीमित कंपनियाँ… बिड ओपनिंग में समय का अंतर… अधीक्षण अभियंता का सिग्नेचर न होना… बार-बार रिटेंडर…*

*क्या ये सब महज प्रशासनिक लापरवाही है?* या *फिर इसमें कुछ पूर्व-योजना हो सकती है?* *दस्तावेज कई सवाल छोड़ गए हैं। जवाब अभी तक कोई नहीं दे रहा।* खैर

 

*युद्ध अभी शेष है*।

 

*अविजित आनन्द संपादक और चन्द्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ*

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

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