*भ्रष्टाचार की दीमक और आईने से नाराज़ व्यवस्था,*
*अवैध निर्माण, रिश्वत का जाल और जवाबदेही से भागता तंत्र,*
*संवाददाता सैफ साबरी,*
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को केवल नारा नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकता बनाया है। यही कारण है कि सतर्कता अधिष्ठान विजिलेंस, की कार्रवाई में लखनऊ विकास प्राधिकरण, एलडीए के अवर अभियंता, सुपरवाइजर और एक निजी व्यक्ति का 7.50 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया जाना केवल तीन व्यक्तियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस सड़े हुए तंत्र का पर्दाफाश है जिसकी दुर्गंध वर्षों से शहर के विकास पर भारी पड़ रही थी।
सवाल यह नहीं कि तीन लोग पकड़े गए। सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार केवल तीन लोगों तक सीमित था, या यह पूरी व्यवस्था की नसों में दौड़ता हुआ ज़हर बन चुका था?
जब किसी अवैध निर्माण की नींव पड़ती है, तब केवल ईंट और सीमेंट नहीं लगते, बल्कि नियमों की हत्या, कानून का गला घोंटना और जनता के विश्वास का सौदा भी होता है। अगर एक अवर अभियंता करोड़ों के खेल में उतर जाता है, तो यह मान लेना कठिन है कि उसे व्यवस्था का कोई संरक्षण प्राप्त नहीं था। इसलिए जांच केवल रिश्वत की रकम तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन अवैध निर्माणों तक भी पहुंचनी चाहिए जिनके नाम पर यह वसूली की जा रही थी।
व्यंग्य यही है कि जब अवैध निर्माण आसमान छूते हैं तो विभाग की आंखें बंद रहती हैं, लेकिन जैसे ही कोई पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ता या जागरूक नागरिक सवाल उठाता है, अचानक पूरा विभाग जाग जाता है, मानो समस्या अवैध निर्माण नहीं, बल्कि उसे उजागर करने वाला व्यक्ति हो। बचपन में एक कहावत पढ़ी थी। मुर्गा सुबह जगाता है, इसलिए उसका गला काट दिया जाता है। दुर्भाग्य से कई विभागों में आज भी यही मानसिकता दिखाई देती है। जो भ्रष्टाचार की नींद तोड़ने की कोशिश करता है, वही सबसे पहले निशाने पर आ जाता है।
पत्रकारिता का धर्म सत्ता का गुणगान नहीं, बल्कि सच का आईना दिखाना है। आईना अगर चेहरा बदसूरत दिखा दे तो दोष आईने का नहीं होता, लेकिन विडंबना यह है कि कुछ अधिकारी आईना साफ करने के बजाय उसे ही तोड़ देना चाहते हैं।
एलडीए के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर प्रवेश-नियंत्रण और फर्जी शिकायत करने वालों पर एफआईआर की बात कही है। यदि यह नीति निष्पक्ष रूप से लागू होती है तो निश्चित ही उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि वास्तविक शिकायतकर्ताओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को पूर्वग्रह से ग्रसित होकर ब्लैकमेलर न करार दिया जाए।
शिकायत लोकतंत्र का अपराध नहीं, बल्कि सुधार का सबसे प्रभावी माध्यम है। यदि कोई शिकायत तथ्यहीन है तो उसका उत्तर तथ्यों के साथ दिया जाना चाहिए। लेकिन यदि शिकायत सही है, तो शिकायतकर्ता को कठघरे में खड़ा करना न्याय नहीं, व्यवस्था की कमजोरी का प्रमाण बन जाता है।
आज भी बड़ा प्रश्न यह है कि जब किसी अवैध निर्माण की शिकायत होती है, तो एलडीए का अधिकृत पक्ष कौन रखेगा? उपाध्यक्ष, सचिव, अपर सचिव, अक्सर कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं होता। आरटीआई और आईजीआरएस के माध्यम से मांगी गई जानकारी का भी कई बार गोलमोल या औपचारिक जवाब देकर निस्तारण कर दिया जाता है। यदि विभाग पारदर्शी है, तो पारदर्शिता उत्तरों में भी दिखाई देनी चाहिए।
लखनऊ के कई घनी आबादी वाले इलाकों में आवासीय भूखंडों पर व्यावसायिक निर्माण धड़ल्ले से खड़े हो रहे हैं। यदि किसी दिन वहां आग या कोई बड़ी दुर्घटना हो जाए, तो क्या जिम्मेदारी केवल बिल्डर की होगी, या उन अधिकारियों की भी जिन्होंने आंखें मूंद लीं? शहर का मास्टर प्लान कागजों में सुरक्षित रह जाए और जमीन पर अराजकता फैल जाए, तो यह विकास नहीं, विनाश को जन्म देना है।
यह भी गहन जांच का विषय होना चाहिए कि जिन निर्माणों के नाम पर रिश्वत मांगी जा रही थी, क्या वे नियमों के अनुरूप थे? यदि नहीं, तो उन फाइलों पर हस्ताक्षर किसने किए? किन अधिकारियों ने आंखें बंद रखीं? और इससे विभाग के राजस्व को कितना नुकसान पहुंचा?
इसी कड़ी में एक और गंभीर प्रश्न यह भी है कि यदि विकास प्राधिकरण में करोड़ों रुपये के टेंडर, भवनों के सौंदर्यीकरण और अन्य कार्य पूरी पारदर्शिता से हुए हैं, तो उनकी लागत, गुणवत्ता, टेंडर प्रक्रिया और भुगतान का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करने में संकोच क्यों? जनता का पैसा किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की अमानत है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो जांच से डर कैसा?
योगी सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी नीति पर जनता को अटूट भरोसा है। इसलिए अब अपेक्षा केवल निलंबन और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पूरी श्रृंखला की निष्पक्ष जांच हो और दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून के कटघरे में लाया जाए।
आलोचना किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, व्यवस्था की खामियों से है। यदि विभाग ईमानदारी से आत्ममंथन करेगा तो उसकी साख बढ़ेगी, लेकिन यदि सवाल पूछने वालों को ही दबाया जाएगा तो जनता के मन में अविश्वास और गहरा होगा।
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा दुश्मन कोई शिकायतकर्ता नहीं, बल्कि पारदर्शिता है। और पत्रकार का सबसे बड़ा अपराध सच लिखना नहीं, बल्कि सच छिपाना होता है। सरकारी कुर्सी शासन करने के लिए नहीं, सेवा करने के लिए होती है और जनता का सवाल पूछना किसी अधिकारी का अपमान नहीं, बल्कि लोकतंत्र का वास्तविक सम्मान है।
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