साहित्यकार जहां भी बैठता है चिंतन उसके साथ होता है फिर हुई चाय पर चर्चा-

*,साहित्यकार जहां भी बैठता है चिंतन उसके साथ होता है फिर हुई चाय पर चर्चा–

* लेकिन इस बार एक ऐसा चिंतन जिससे घर समाज रिश्ते देश संस्कृति सभी प्रभावित हो रहे हैं डिजिटल मीडिया- डिजिटल मीडिया- यूं तो हमारे लिए बहुत लाभदायक और एक एसी ग्रोथ है जिसे हम वर्षों नहीं कर सकते थे बो डिजिटल मीडिया- ने उपलब्ध करवाया है-लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमने इसका भी हमने अपने अपने स्वार्थ के लिए स्तेमाल कर लिया और इसके बेशुमार फाइदे उठाने थे हमे बो कम नुकसान ज्यादा उठा लिए बचपन गुम हो गया-

बच्चे अब खिलौने नहीं खेलते हैं–

धरती का स्पर्श और तन पर मिट्टी के वस्त्र नहीं पहनते हैं,,

 

इन्हें अब मां के आंचल,, और लोरी सुनकर नींद नहीं आती है,,

एक हाथ में दूध की बोतल,,

दूसरे में मोबाइल देखकर नींद आती है,,

फलते फूलते घरौंदे अब खामोश हो गये,,

एक दूसरे से अब बात नहीं होती है,,

दुआओं के कमरे से अब कराहने और खांसने की आवाजें नहीं आती है,,

दुआएं उग उगकर मुठरा जाती है,,

ऊंची दीवारों की ग्रोथ में,,

अब दुआओं के हाथ और आवाज नहीं पहुंचती है,,

बैठे बैठे मेहनत अब रोगी होने लगी है,,

कमाई बिस्तर पर होने लगी है,,

मुफ्त में जश्न और दौलत,,

देने लगी है,,

ये कैसा है परिवर्तन का पतझड़ है,,

इंसान नंगा शिक्षा और संस्कृति संस्कार शर्मसार कर रही है,,

ये कैसा परिवर्तन है कि हम खुद ही भूल गए हैं।

*दीप्ति,*✍️

Leave a Comment