चाय पर साहित्य की चर्चा’ गोष्ठी के अंतर्गत “भारतीय संस्कृति के लिए डिजिटल मीडिया : साधक या बाधक, रिपोर्ट सुलेखा राजेश चौधरी

‘चाय पर साहित्य की चर्चा’ गोष्ठी के अंतर्गत “भारतीय संस्कृति के लिए डिजिटल मीडिया : साधक या बाधक” विषय पर एक विचारोत्तेजक एवं ज्ञानवर्धक आयोजन किया गया। यह संयोजिका पूनम यादव के हाजीपुरा, शिकोहाबाद रोड, एटा, स्थित आवास पर सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य डॉ प्रेमी राम मिश्र ने की।

  1. एटा,संयोजिका पूनम यादव ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। शिक्षक संजय सिंह ने डिजिटल मीडिया के व्यापक स्वरूप का गंभीर विश्लेषण किया।वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डिजिटल मीडिया आज के युग में ज्ञान, शिक्षा, साहित्य, कला और संस्कृति के प्रचार-प्रसार का अत्यंत सशक्त माध्यम बन चुका है। इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति, योग, आयुर्वेद, भारतीय भाषाएँ, लोककला एवं संस्कार विश्व स्तर पर नई पहचान प्राप्त कर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार नेत्र पाल सिंह ने कहा कि आज सब कुछ हमारी मुट्ठी में है किंतु जरूरत है उसे ठीक से उपयोग करने की। अनेक वक्ताओं ने कहा कि सोशल मीडिया एवं डिजिटल मंचों ने युवा पीढ़ी को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया है।

बलराम सरस ने डिजिटल मीडिया के नकारात्मक पक्ष पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित एवं भ्रामक सामग्री, पाश्चात्य अंधानुकरण, अश्लीलता तथा पारिवारिक मूल्यों में गिरावट जैसी समस्याएँ भारतीय संस्कृति के लिए चुनौती बनती जा रही हैं। इस संदर्भ में डॉ के. पी. सिंह जी ने विशेष रूप से युवाओं को विवेकपूर्ण एवं मर्यादित डिजिटल उपयोग के लिए प्रेरित किया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में आचार्य डॉ पी. आर. मिश्र ने कहा कि “डिजिटल मीडिया स्वयं में न तो साधक है और न ही बाधक, उसका स्वरूप उपयोगकर्ता की सोच एवं उद्देश्य पर निर्भर करता है। यह पुस्तकों का विकल्प नहीं बन सकता। इस तकनीकी आकर्षण ने एकाग्रता, गहरी समझ एवं अध्ययन की प्रवृत्ति को कमजोर किया है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के संरक्षण हेतु पारिवारिक जनों को बच्चों को संस्कारित करने पर विशेष बल दिया। यदि शैशव काल में बच्चों की सही ढंग से परवरिश नहीं की गई तो उनके जीवन के साथ साथ परिवार को भी अभिशप्त होना पड़ेगा। हमें इस विषय में दृढ़ता और कठोरता के साथ बचपन को संस्कारित करने का प्रयास करना होगा।

कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन करते हुए डॉ ओम ऋषि भारद्वाज ने निष्कर्ष रूप में कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा सदैव जीवित रहेगी, आवश्यकता केवल इतनी है कि डिजिटल माध्यमों का प्रयोग विवेक, नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना के साथ किया जाए।

अंत में संयोजिका पूनम यादव ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का वातावरण अत्यंत गरिमामय , साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण रहा।गोष्ठी ज्ञान एवं चिंतन परक जागरूकता का सुंदर संगम सिद्ध हुई। इस अवसर पर जैन विदुषी बबिता जैन, डॉ सुधीर पालीवाल, प्रो. डॉ. के.पी .सिंह, वरिष्ठ पत्रकार नेत्रपाल सिंह, पत्रकार दीप्ति चौहान, भीष्म पाल सिंह यादव, रामावतार आर्य, संजय सिंह, रजनी वर्मा मैनपुरी, बलराम सरस, अमोल श्रीवास्तव पत्रकार, शिक्षक पवन जी सहित अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित हुए।

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