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एटा मेडिकल कॉलेज ने पकड़ा फाइलेरिया का दुर्लभ मामला, हाथ की गांठ में निकले जिंदा परजीवी, रिपोर्ट अनिल सोलंकी

एटा मेडिकल कॉलेज ने पकड़ा फाइलेरिया का दुर्लभ मामला, हाथ की गांठ में निकले जिंदा परजीवी

FNAC जांच से खुला राज, नाइट ब्लड सैंपल के बिना ही लैब ने पकड़ी बीमारी

 

एटा। जिले के वीरांगना अवंतीबाई लोधी स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय ने चिकित्सा जगत में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यहां की साइटोपैथोलॉजी लैब ने हाथ की गांठ में फाइलेरिया के जिंदा माइक्रोफाइलेरिया खोज निकाले हैं। खास बात यह है कि बिना रात में खून की जांच किए सीधे गांठ से ही परजीवी की पहचान कर ली गई। चिकित्सा विज्ञान में इसे अत्यंत दुर्लभ केस माना जा रहा है।

 

गांठ की शिकायत लेकर पहुंचा था मरीज

अस्पताल की ओपीडी में एक मरीज हाथ में सूजन और गांठ की शिकायत लेकर पहुंचा था। सामान्य तौर पर ऐसी गांठ को ट्यूमर या फोड़ा समझा जाता है। मरीज को जांच के लिए पैथोलॉजी विभाग भेजा गया। यहां साइटोपैथोलॉजी लैब की विभागाध्यक्ष डॉ. अंकिता शर्मा के नेतृत्व में FNAC यानी फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी की गई।

 

सुई से गांठ का सैंपल लेकर जब कांच की स्लाइड पर रखकर सूक्ष्मदर्शी से देखा गया तो डॉक्टरों की टीम हैरान रह गई। स्लाइड पर फाइलेरिया रोग फैलाने वाले Wuchereria bancrofti के शीथेड माइक्रोफाइलेरिया साफ-साफ हिलते हुए दिखाई दिए।

 

क्यों दुर्लभ है यह मामला

डॉ. अंकिता शर्मा ने बताया कि फाइलेरिया के परजीवी आमतौर पर इंसान के लसीका तंत्र में रहते हैं और रात 10 बजे से 2 बजे के बीच खून में आते हैं। इसलिए इसकी जांच के लिए नाइट ब्लड सैंपल लिया जाता है। बीमारी के लक्षण भी अक्सर पैर में हाथीपांव जैसी सूजन या पुरुषों में हाइड्रोसील के रूप में दिखते हैं।

 

लेकिन एटा के इस मरीज में परजीवी हाथ की त्वचा के नीचे गांठ बनाकर बैठे थे। दिन में ही FNAC से परजीवी पकड़ में आ जाना मेडिकल साइंस के लिए नई जानकारी है। देश-दुनिया में ऐसे मामले गिनती के ही मिले हैं।

 

प्राचार्य ने दी टीम को बधाई

मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. बलवीर सिंह ने इस सफल निदान पर पैथोलॉजी विभाग की पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा, “यह केस साबित करता है कि हमारे यहां विश्वस्तरीय लैब और दक्ष विशेषज्ञ मौजूद हैं। ऐसे दुर्लभ केस एमबीबीएस छात्रों के लिए केस स्टडी बनेंगे। इससे उनकी क्लीनिकल समझ मजबूत होगी।”

 

डॉ. सिंह ने बताया कि मरीज को तुरंत मेडिसिन विभाग में रेफर कर एंटी फाइलेरियल दवाएं शुरू करा दी गई हैं। समय पर पहचान होने से मरीज को बड़ा खतरा टल गया है।

 

तीन वजह से खास है यह केस

1. जगह बदली, बीमारी वही: फाइलेरिया आमतौर पर पैर या जननांगों को प्रभावित करता है। हाथ की गांठ में मिलना मेडिकल किताबों में रेयर प्रेजेंटेशन कहलाता है।

2. जांच का नया रास्ता: नाइट ब्लड सैंपल के बिना FNAC से सीधे परजीवी पकड़ना डायग्नोसिस की नई दिशा देता है। इससे मरीजों का समय और पैसा बचेगा।

3. जनता के लिए चेतावनी: शरीर पर कहीं भी गांठ, सूजन या दर्द हो तो उसे मामूली समझकर टालें नहीं। वह फाइलेरिया, टीबी या कैंसर का संकेत भी हो सकती है।

 

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े डॉक्टरों का कहना है कि परजीवी सालों तक शरीर में चुपचाप पड़ा रहता है। जब तक पैर में सूजन दिखे, तब तक लसीका तंत्र को काफी नुकसान हो चुका होता है। एटा का यह केस बताता है कि शुरुआती स्टेज में ही गांठ के रूप में बीमारी पकड़ी जा सकती है।

 

प्रधानाचार्य डॉ. बलवीर सिंह ने जिलेवासियों से अपील की है कि शरीर पर किसी भी तरह की गांठ, सूजन या बदलाव दिखे तो तुरंत सरकारी अस्पताल में जांच कराएं। मेडिकल कॉलेज में FNAC, बायोप्सी समेत सभी जांचें मुफ्त उपलब्ध हैं। साथ ही सरकार की ओर से चल रहे MDA अभियान में फाइलेरिया रोधी दवा जरूर खाएं। यही बीमारी से बचाव का सबसे कारगर तरीका है।

 

_फोटो:_ माइक्रोस्कोप से जांच करतीं डॉ. अंकिता शर्मा और माइक्रोफाइलेरिया की स्लाइड

 

 

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