आपका नाम डी. रूपा मौदगिल है। आपको 23 जून 2017 को उन्हें बेंगलुरु जेल की DIG बनाया गया, लेकिन वह इस पद पर सिर्फ 17 working days ही रहीं। इन 17 दिनों में उन्होंने जेल का तीन बार निरीक्षण किया और कई गंभीर बातें सामने रखीं। उन्होंने पाया कि जेल में नशे का इस्तेमाल हो रहा था, एक-एक डॉर्मिटरी में 30 से 50 कैदी ठूंसे जा रहे थे, और सबसे बड़ा खुलासा यह था कि वी.के. शशिकला को जेल में आम कैदी जैसी सुविधा नहीं, बल्कि VIP सुविधा मिल रही थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, शशिकला के पास पांच अलग प्राइवेट सेल थे, अलग कॉरिडोर था, अपनी रसोई थी, अपना कुक था, और एक ऐसा मीटिंग रूम था जहां CCTV नहीं था और घंटों मुलाकातें होती थीं। डी. रूपा ने अपनी रिपोर्ट में आरोप लगाया कि इन सुविधाओं के लिए जेल अधिकारियों को ₹2 करोड़ की रिश्वत दी गई। उनके सीनियर ने इस रिपोर्ट को गलत बताया, सरकार ने उनका ट्रांसफर कर दिया, और मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें मीडिया के पास नहीं जाना चाहिए था।
मतलब साफ था … जिस अधिकारी ने जेल की सच्चाई दिखाई, उसी को हटा दिया गया। लेकिन 2019 में स्वतंत्र जांच में वही बातें सही निकलीं। शशिकला को VIP ट्रीटमेंट मिला था, रिकॉर्ड में गड़बड़ी हुई थी और जेल प्रशासन में गंभीर लापरवाही हुई थी। जिस रिपोर्ट के लिए डी. रूपा को चुप कराने की कोशिश हुई, दो साल बाद वही रिपोर्ट सही साबित हुई।
यह पहली बार नहीं था। 18 साल की सेवा में उनका 41 बार ट्रांसफर हुआ, क्योंकि जब भी उन्होंने ताकतवर लोगों के गलत कामों को छुआ, सिस्टम ने उन्हें हटाने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने कभी किसी ट्रांसफर को कोर्ट में चुनौती नहीं दी। उनका कहना था, “जहां भी मेरी पोस्टिंग होगी, मैं ईमानदारी से अपना काम करूंगी। आगे क्या होता है, इसकी चिंता नहीं करती।”
41 ट्रांसफर। कोई समझौता नहीं। कोई डर नहीं। यही असली ईमानदारी है।






