चम्बल की लालामी नीली स्याह कैसे बनी  शंकर देव तिवारी 

आओ जाने तो एक कहानी

 

चम्बल की लालामी नीली स्याह कैसे बनी

शंकर देव तिवारी

 

 

चम्बल।राबिंन हुड चम्बल का जब कथित मुठभेड़ में मार गिराया गया और उसका एक मात्र जीवित पुत्र तहसील दार गिरफ्तार हो गया तो समूची पुलिस उसे मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। क्योंकि चम्बल के एक राबिंन हुड को ही तो धोखे से जहर खिलवा मार सकी पुलिस टीम तहसीलदार को मारने का प्लान नहीं बना सकी। जिसके पीछे थी दस्यु सम्राट मानसिंह राठौर की वची वागियों की गेंग जिसका नेतृत्व संभाले हुए थे रूपे और लोकमन दीक्षित। इन दोनों के बारे में चर्चित था उन्होंने ही दाऊ मानसिंह से कोई खून नहीं होने दिया था उस समय तक जो भी मामले घटे थे सभी के आखेटक दोनों ही थे। मानसिंह के हाथों एक ही खून हुआ था जिसकी वजह से उसकी सजा भी काट चुके थे मगर उक्त साहूकार पंडित और पुलिस की बदोलत चम्बल का इतिहास लिखा गया।

मजे की बात तो तब हुई जब रूपे के एक पत्र ने ही दैनिक सैनिक अखबार में राष्ट्र पति राजेंद्र जी को लिखे पत्र से ही चम्बल में शांति की वयार चल सकी। जिसे अभियान को सर्वोदय के बाबा विनोवा ने संभाला। मगर शांति का बीज बोने वाला भी एक फर्जी मुठभेड़ में मारा गया। तब लोकमंन ने मोर्चा संभाला। मगर तब तक त्सीलदार के सभी मुदमें रूपे ने बीहड़ में रह लड़े। बहुत बड़ी कहानी हैं चम्बल की लालानी केस श्याह नीला पानी बनने की। जोरा का समर्पण जैसे ही हुआ तो फिर फलन खा हथियार डालने तक की अपनी कहानी में मानसिंह के मन्दिर बनने और उसका लोकार्पण दुश्मन खा नाती डाल चन्द के द्वारा कराने का निर्णिय मेरे प्रस्ताव पर दश्यू सम्राट त्सीलदार द्वारा स्वीकारना। वे राम मन्दिर अभियान में मुलायम सिंह से चुनाव भी लड़े। जिसे वे रद्द काराके सफल हुए थे। ये चुनाव भी मेरे ही प्रस्ताव पर था। चम्बल का रंग लाल 60से नहीं ३९से हुआ था। जिसका अंत ५६ साल बाद मानसिंह और उनकी पत्नी के मन्दिर बनने के साथ हुआ।

 

चम्बल आज भी है। बीहड़ आज भी हैं। लेकिन अब वहाँ डर की नहीं, इतिहास की गूंज सुनाई देती है। जब हवा उन खाइयों से गुजरती है, तो लगता है जैसे वह कोई पुरानी कहानी सुना रही हो। एक ऐसी कहानी जिसमें बंदूकें थीं, खून था, लेकिन अंत में जीत इंसानियत की हुई।

और जब जौरा में फिर से बागी समर्पण दिवस मनाया जा रहा है, तो वह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं होगा। वह उस विश्वास का पुनर्जन्म होगा जिसने कभी बीहड़ों में शांति बो दी थी।

चम्बल की धूल अब भी उड़ती है। लेकिन अब उसमें डर नहीं, इतिहास की खुशबू है।

 

भारत ने चम्बल में सिर्फ डकैतों को नहीं हराया, उसने अपने ही भटके हुए लोगों को वापस पाया। वह लेख विदेशों में भी प्रकाशित हुआ और यह अनुभव आज भी मन में ताजा है। सैकड़ों खूंखार बागियों ने जब मुरैना में आत्म समर्पण किया तो लगा ये किसी और दुनिया की कहानी थी। लेकिन नहीं, वह यहीं हुआ था, हमारी ही धरती पर।

और अब, उसी इतिहास को याद करने का समय फिर आया है। जौरा स्थित गांधी आश्रम में बागी समर्पण दिवस की 55वीं वर्षगांठ पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हो रही है। यह स्मृति का उत्सव है। यह उस क्षण को फिर से जीने का प्रयास है जब बंदूकें झुकी थीं और इंसानियत उठ खड़ी हुई थी। इस संगोष्ठी में देश भर के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक और पत्रकार भाग लेंगे। अहिंसा, सामाजिक बदलाव और गांधीवाद के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होगी। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह होगी, जब उन बागियों को सम्मानित किया जाएगा जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में लौटने का साहस दिखाया। फिर संवाद का सिलसिला चलेगा। विचारों का आदान प्रदान होगा। पुराने अनुभवों को नई पीढ़ी के सामने रखा जाएगा।

यह भी याद किया जाएगा कि कैसे एक समय में चम्बल के बीहड़ देश के लिए चुनौती थे, और कैसे गांधीवादी प्रयासों ने उन्हें परिवर्तन की प्रयोगशाला बना दिया।

आज जब समाज फिर से तनाव और विभाजन के दौर से गुजर रहा है, तब चम्बल की यह कहानी और भी प्रासंगिक हो जाती है।

यह हमें सिखाती है कि कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका समाधान न हो सके।

जरूरत होती है विश्वास की, संवाद की, और धैर्य की।

श्यामल नीर के तीर से

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं के बीच पसरे वे बीहड़ किसी भूगोल की साधारण रचना नहीं। वे धरती के फटे हुए सीने जैसे थे, गहरे, टेढ़े मेढ़े, रहस्यमयी। सूरज की रोशनी भी वहाँ सीधी नहीं उतरती थी, जैसे डरती हो कि कहीं लौट न पाए। धूल ऐसी उड़ती थी मानो हर कण में एक अधूरी कहानी अटकी हो। कहीं खामोशी इतनी गाढ़ी कि कानों में गूंजने लगे, तो कहीं अचानक किसी अज्ञात दिशा से आती आवाज दिल की धड़कन बढ़ा दे।

1939 और 90तक के दशक। यह वह समय था जब चम्बल सिर्फ एक नदी नहीं, वह एक मनःस्थिति थी।

सड़कें वहाँ जाकर खत्म हो जाती थीं। कानून कागजों में रह जाता था। शासन की पहुँच बीहड़ों की गहराई में खो जाती थी।

बीहड़ों की धरती पर चलना आसान नहीं था। पांव रखते ही मिट्टी खिसक जाती। एक मोड़ के बाद क्या है, कोई नहीं जानता। कांटेदार झाड़ियां, गहरी खाइयां, सांपों की सरसराहट, और ऊपर आसमान में मंडराते गिद्ध। यह प्रकृति का ऐसा दुर्ग था, जिसे इंसान ने नहीं बनाया, पर जिसने इंसान को अपने हिसाब से ढाल लिया।

बृज खंडेलवाल की लिखी चम्बल गाथा से

इन्हीं बीहड़ों में जन्म लेते थे बागी।

डकैत कह देना आसान है, पर कहानी उससे कहीं ज्यादा जटिल थी। कोई किसान था जिसे जमींदार ने कुचल दिया। कोई युवा था जिसे पुलिस की ज्यादती ने विद्रोही बना दिया। कोई ऐसा था जिसे न्याय नहीं मिला, और उसने बंदूक उठा ली।

बीहड़ों में कानून की किताब नहीं चलती थी। चलती थी बंदूक की नली और बदले की आग।

लेकिन हर कहानी में सिर्फ अंधेरा नहीं होता। कहीं न कहीं रोशनी भी जन्म लेती है।

और चम्बल में वह रोशनी लेकर आए कई गांधीवादी, सर्वोदय के नेता, आचार्य विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण, आदि। दुबला पतला शरीर। शांत चेहरा। न कोई हथियार, न कोई डर। बस एक विश्वास कि इंसान बदल सकता है। यह विश्वास लेकर वे बीहड़ों में उतरे। जहाँ पुलिस जाने से कतराती थी, वहाँ वे नंगे पांव चले। इस आंदोलन को नई ताकत मिली, और लोग जुड़े।

कहानी किसी फिल्म की तरह लगती है, लेकिन यह हकीकत थी। डकैतों ने संदेश भेजा। वे आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, लेकिन अपमान नहीं सहेंगे।

और फिर वह दिन आया जब बीहड़ों ने एक अनोखा दृश्य देखा। मंच सजा। भीड़ जुटी। पुलिस भी थी, प्रशासन भी। और फिर एक एक करके बागी सामने आए।

हाथों में बंदूक थी, लेकिन सिर झुका हुआ। उन्होंने हथियार जमीन पर रख दिए। उस दिन गोली नहीं चली। तालियां बजीं। यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं था। यह एक युग का अंत था और दूसरे युग की शुरुआत।

इस पूरी कहानी ने सिनेमा को भी गहराई से प्रभावित किया। उस दौर की जिस देश में गंगा बहती है, गंगा जमुना, मुझे जीने दो, हीरोज डकैतों के दिल बदल देते दिखते हैं। आ अब लौट चलें ! सुनील दत्त की मुझे जीने दो बीहड़ों की सच्चाई को बिना किसी परदे के दिखाती है।

 

1956में वागी चम्बल के राबिन हुड का अंत

२२माई १९६०भिंडविनोवा २०

१६अप्रेल ७२जय प्रकाश ६५९

जून ७६में बटेश्वर६००

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