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शाहजहाँपुर के पुवायां रोड पर झाड़ियों के बीच मिला 147 साल पुराना ब्रिटिश सैन्य इतिहास, सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल, रिपोर्ट राहुल गुप्ता

शाहजहाँपुर के पुवायां रोड पर झाड़ियों के बीच मिला 147 साल पुराना ब्रिटिश सैन्य इतिहास, सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल

शाहजहाँपुर। उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर शाहजहाँपुर में पुवायां रोड स्थित मछली मार्केट के ठीक पीछे बने सदियों पुराने ‘गोरा कब्रिस्तान’ से इतिहास के कुछ बेहद चौंकाने वाले और दुर्लभ पन्ने सामने आए हैं। दशकों से उपेक्षा का शिकार और झाड़ियों से घिरे इस ब्रिटिश कालीन कब्रिस्तान में जब स्थानीय इतिहास प्रेमियों ने खोजबीन की, तो वहाँ लगभग डेढ़ सदी पुराने ऐसे शिलालेख और सैन्य प्रतीक चिन्ह मिले, जिनका सीधा संबंध इंग्लैंड के शाही सैन्य गौरव से है। इन ऐतिहासिक धरोहरों की तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं और लोग शाहजहाँपुर के इस अनछुए पहलू को देखकर हैरान हैं।
इस खोज में सबसे पहला और भावुक कर देने वाला सिरा ब्रिटिश सेना की 54वीं रेजिमेंट के एक युवा सैनिक की कब्र के रूप में मिला है। लाल बलुआ पत्थर से बने इस भव्य स्मारक के शीर्ष पर एक पारंपरिक ‘सेल्टिक क्रॉस’ बना है, जिस पर दर्ज शिलालेख आज 147 साल बाद भी पूरी तरह साफ पढ़ा जा सकता है। इस पर लिखा है कि यह कब्र ब्रिटिश सेना की ‘H.M.’s 54th Regiment’ के सार्जेंट एच. इलियट (Sergeant H. Elliott) की है, जिनका निधन 27 फरवरी 1879 को महज 27 वर्ष की अल्पायु में शाहजहाँपुर छावनी में हो गया था।
इस स्मारक का सबसे दिलचस्प और मानवीय पहलू यह है कि इसे इंग्लैंड से आए सार्जेंट इलियट के किसी परिवार ने नहीं, बल्कि उनके हमवतन सैनिक साथियों ने बनवाया था। शिलालेख के निचले हिस्से पर धुंधले अक्षरों में दर्ज है कि 54वीं रेजिमेंट के जवानों ने अपने इस प्रिय सार्जेंट के प्रति गहरे सम्मान और लगाव को प्रकट करने के लिए चंदा जुटाकर इस भारी-भरकम पत्थर को यहाँ स्थापित किया था। इतिहासकारों के अनुसार, 19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत के गर्म मौसम में तैनात होने वाले ब्रिटिश सैनिकों के लिए मलेरिया, हैजा और लू जैसी बीमारियां सबसे बड़ा काल होती थीं, और सार्जेंट इलियट भी संभवतः इसी का शिकार हुए थे।इसी कब्रिस्तान के एक दूसरे कोने में जमीन पर बिखरे मलबे और सूखी घास के बीच इतिहास का एक और अनमोल खजाना मिला है। यहाँ लाल मिट्टी (टेराकोटा) से बना एक बेहद नक्काशीदार ब्लॉक गिरा हुआ मिला, जो ब्रिटिश सेना की मशहूर 56वीं (वेस्ट एसेक्स) रेजिमेंट का आधिकारिक प्रतीक चिन्ह (Regimental Insignia) है। इस प्रतीक चिन्ह के ऊपर बने रिबन पर साफ अक्षरों में इस टुकड़ी का ऐतिहासिक निकनेम “POMPADOURS” (पॉम्पैडोर्स) उकेरा गया है, जो 18वीं सदी की फ्रांस की प्रसिद्ध फैशन आइकॉन ‘मैडम डी पॉम्पैडोर’ के नाम पर सैनिकों के खास बैंगनी-गुलाबी रंग के कोट के बॉर्डर के कारण पड़ा था।
इस राजकीय बैज के ठीक बीच में एक किला बना है और लैटिन भाषा में उनका आदर्श वाक्य “MONTIS INSIGNIA CALPE” लिखा है, जिसका अर्थ ‘जिब्राल्टर के चट्टान का प्रतीक चिन्ह’ है। यूरोप में जिब्राल्टर की ऐतिहासिक जंग जीतने के बाद इस रेजिमेंट को यह शाही सम्मान मिला था और 1870 के दशक में कानून-व्यवस्था संभालने के लिए इन्हें शाहजहाँपुर कैंट में तैनात किया गया था। इस वीआईपी रेजिमेंट के बैज का शाहजहाँपुर की मिट्टी में मिलना यह साबित करता है कि पुवायां रोड की इस गुमनाम जगह के नीचे वैश्विक इतिहास की बड़ी घटनाओं के सबूत दफन हैं, जिन्हें सहेजने की सख्त जरूरत है

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