नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है। भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव रखने वाला यह संगठन आज देश का सबसे बड़ा और अनुशासित स्वयंसेवी ढांचा बन चुका है। केवल वैचारिक धरातल तक सीमित न रहकर, संघ ने आपदा प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक समरसता जैसे बुनियादी क्षेत्रों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन (BMF) नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक और इंटरनेशनल मीडिया आर्मी के मुख्य संयोजक एके बिंदुसार के दृष्टिकोण के आलोक में, राष्ट्र-निर्माण में संघ के योगदान और उसकी संगठनात्मक कार्यप्रणाली:
व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण: अनुशासित युवा शक्ति की नींव
आरएसएस की मूल कार्यपद्धति दैनिक शाखा प्रणाली पर आधारित है। एके बिंदुसार के अनुसार, संघ का प्राथमिक कार्य ‘व्यक्ति निर्माण’ है, जो आगे चलकर ‘राष्ट्र निर्माण’ का मुख्य आधार बनता है।
चरित्र निर्माण और शारीरिक अनुशासन: दैनिक शाखाओं में होने वाले खेल, योग, सूर्य नमस्कार और संचलन युवाओं में शारीरिक सहनशक्ति और मानसिक एकाग्रता का विकास करते हैं।
नैतिक मूल्य और राष्ट्रनिष्ठा: संघ की शिक्षा प्रणाली युवाओं में स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और देशहित को प्राथमिकता देने का संस्कार विकसित करती है।
निष्काम सेवा: संकट के समय अग्रिम पंक्ति में स्वयंसेवक
संघ का अनुषांगिक संगठन ‘सेवा भारती’ वर्तमान में देशभर में लाखों सेवा प्रकल्प चला रहा है।
आपदा राहत कार्य: बाढ़, भुज व लातूर का भूकंप, सुनामी, चक्रवात या कोविड-19 महामारी के दौरान स्वयंसेवकों ने त्वरित तत्परता दिखाते हुए भोजन, दवाएं और प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराई।
निःस्वार्थ भाव: बिना किसी प्रचार की लालसा के समाज के अंतिम व्यक्ति तक सहायता पहुँचाना संघ की सेवा भावना का मूलमंत्र रहा है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और स्वदेशी चेतना की पुनर्प्रतिष्ठा
एके बिंदुसार का मानना है कि संघ ने भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति, परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक संदर्भों में प्रासंगिक बनाए रखा है।
सांस्कृतिक जड़ों का संरक्षण: वैश्वीकरण के दौर में संघ ने भारतीय जीवन-मूल्यों, पारिवारिक व्यवस्था और भाषाई चेतना को संजोने का प्रयास किया है।
स्वदेशी और आर्थिक आत्मनिर्भरता: ‘स्वदेशी जागरण मंच’ के माध्यम से स्थानीय उद्योगों और भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया गया, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का वैचारिक आधार है।
सामाजिक समरसता: जातिगत भेदभाव के विरुद्ध व्यावहारिक कदम
पत्रकारिता और सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से संघ के सामाजिक समरसता अभियान अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
‘एक मंदिर, एक कुआं, एक श्मशान’: संघ ने समाज में व्याप्त जातिगत ऊंच-नीच और अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए धरातली प्रयास किए हैं।
एकीकृत समाज की अवधारणा: ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के माध्यम से दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और धर्म-संरक्षण का कार्य कर मुख्यधारा से कटे वर्गों को जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया गया है।
विचार परिवार: हर क्षेत्र में संगठनात्मक उपस्थिति
आरएसएस का ‘विचार परिवार’ समाज के विभिन्न क्षेत्रों में संरचनात्मक योगदान दे रहा है।
शिक्षा क्षेत्र (विद्या भारती): हजारों ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ और ‘विद्या मंदिर’ के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण और संस्कारयुक्त शिक्षा दी जा रही है।
श्रमिक और किसान कल्याण: ‘भारतीय मजदूर संघ’ (BMS) और ‘भारतीय किसान संघ’ (BKS) के माध्यम से बिना किसी हिंसा के श्रमिकों और किसानों के अधिकारों की रक्षा की जा रही है।
एके बिंदुसार और भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी का विश्लेषण यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की सांस्कृतिक अखंडता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। संघ का “राष्ट्र प्रथम” (Nation First) का सिद्धांत केवल एक नारा न होकर लाखों स्वयंसेवकों की कार्यशैली में शामिल है, जो भारत को एक सशक्त और अनुशासित राष्ट्र बनाने की दिशा में प्रयासरत है।
वही दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech), लोकतंत्र में असहमति, तथा पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों पर दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट और संतुलित है। संघ प्रमुख बाहरी नियंत्रण या सेंसरशिप के बजाय “संविधान, आत्म-अनुशासन, भ्रातृत्व और उत्तरदायित्व” पर जोर देते हैं।
डॉ. मोहन भागवत लोकतंत्र में असहमति या विरोध को वैचारिक शत्रुता के रूप में नहीं देखते।
वास्तविक विचार: वे मानते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और सवाल पूछना स्वाभाविक है।
तथ्य: विभिन्न सार्वजनिक संवाद कार्यक्रमों (जैसे दिल्ली का ‘भारत का भविष्य’ और हालिया युवा संवाद) में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “लोकतंत्र में विरोध भी संवाद का ही एक रूप है। विरोध करने वाले पराये नहीं हैं; विविधताओं को स्वीकार करना और उनके साथ समन्वय बनाकर चलना ही भारतीय परंपरा है”।
स्वतंत्रता की सीमा: ‘अधिकार के साथ उत्तरदायित्व’
सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया की स्वतंत्रता पर डॉ. भागवत का मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार हर नागरिक के पास है, लेकिन यह अधिकार निरपेक्ष (Unlimited) नहीं हो सकता।
वास्तविक विचार: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करते समय ‘राष्ट्र हित’ और ‘सामाजिक सद्भाव’ का ध्यान रखना अनिवार्य है।
उनका मानना है कि “हर व्यक्ति को स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन मेरी स्वतंत्रता वहां समाप्त होती है जहां दूसरे की स्वतंत्रता या समाज का हित प्रभावित होता है। अभिव्यक्ति ऐसी होनी चाहिए जो समाज को जोड़े, विभाजन न पैदा करे।”
बैन (सेंसरशिप) का विरोध और ‘आत्म-अनुशासन’ (Self-Regulation)
जब पत्रकारों या डिजिटल मीडिया की आजादी पर राज्य द्वारा प्रतिबंध लगाने (Banning) की बात आती है, तो डॉ. भागवत कानूनी सेंसरशिप के खिलाफ आत्म-नियंत्रण की वकालत करते हैं।
वास्तविक विचार: कानून या सरकारी प्रतिबंधों के बल पर अभिव्यक्ति की आजादी को पूरी तरह दबाना या नियंत्रित करना समस्या का समाधान नहीं है।
मीडिया और सोशल मीडिया के संदर्भ में उनके बयान के अनुसार: “किसी चीज़ पर प्रतिबंध लगाना उत्तर नहीं है; बैन लगाने से चीजें ब्लैक मार्केट में जाती हैं। समाज और मीडिया कर्मियों को स्वयं आत्म-अनुशासन (Self-discipline) और विवेक विकसित करना होगा कि सच क्या है और क्या समाज हित में है।”
पत्रकारों के प्रति सत्य-निष्ठा और निष्पक्षता की अपेक्षा
पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका पर डॉ. भागवत उन्हें केवल आलोचक नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शन करने वाला प्रहरी मानते हैं।
वास्तविक विचार: वे मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं से अपेक्षा करते हैं कि वे सत्य को बिना किसी पूर्वाग्रह, एजेंडे या सनसनीखेजता के सामने लाएं।
उन्होंने बार-बार कहा है कि “पत्रकारिता एक मिशन है। पत्रकारों की अभिव्यक्ति जब तथ्य पर आधारित होती है और उसमें समाज को सकारात्मक दिशा देने का भाव होता है, तब वह राष्ट्र-निर्माण में सबसे बड़ा योगदान देती है”।
डॉ. मोहन भागवत के विचारों का लब्बोलुआब यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक कार्यकर्ताओं/पत्रकारों की भूमिका का वे पूर्ण सम्मान करते हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि इस स्वतंत्रता का उपयोग ‘राष्ट्र प्रथम’, ‘सामाजिक समरसता’ और ‘सत्य-निष्ठा’ के दायित्व के साथ किया जाए।













