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लाइसेंस निगमों के पास, हुक्म शक्ति भवन का, कुर्सी अभियंता की—ऊपर बैठते अनुभवहीन आईएएस, रिपोर्ट जावेद सिद्दीकी

*लाइसेंस निगमों के पास, हुक्म शक्ति भवन का, कुर्सी अभियंता की—ऊपर बैठते अनुभवहीन आईएएस*

लखनऊ — 31 अगस्त,,, उत्तर प्रदेश में बिजली की शिकायत अब केवल लाइट कटने तक नहीं रह गई। सवाल यह है कि हुक्म कौन काटता है—जिस कंपनी के पास लाइसेंस है, या उस दफ्तर के, जिसका वितरण लाइसेंस पंद्रह साल पहले खत्म हो चुका है। और जब हुक्म कटता है, तो कीमत कौन चुकाता है—उपभोक्ता मीटर के बिल में, या मैदानी अभियंता बर्खास्तगी और वसूली के नोटिस में।

2010 में छिन गया अधिकार, आदत नहीं छूटी

21 जनवरी 2010 को उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने मध्यांचल, पूर्वांचल, पश्चिमांचल और दक्षिणांचल को अलग-अलग वितरण लाइसेंस दिए। आदेश में लिखा गया कि ये लाइसेंस उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन का वितरण, रिटेल और बल्क सप्लाई लाइसेंस, 2000 की जगह लेंगे। उसी क्षेत्र में दो लाइसेंसधारी नहीं चल सकते। उस तारीख से UPPCL के पुराने वितरण लाइसेंस का उस क्षेत्र में संचालन बंद हो गया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाद में और कड़ा लिखा। कोर्ट के शब्दों में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के पास वितरण लाइसेंस है ही नहीं। पश्चिमांचल जैसे निगम अपने क्षेत्र के स्वतंत्र लाइसेंसधारी हैं। उन्हें अपनी कंपनी के विभाग की तरह चलाने का उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन को अधिकार नहीं। केवल इसलिए कि शेयर होल्डिंग कंपनी के पास हैं, वितरण का काम दफ्तर की शाखा नहीं बन जाता। ट्रांसमिशन कंपनी बनने के बाद उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के पास ट्रांसमिशन लाइसेंसधारी भी नहीं रही। कोर्ट ने पूछा भी—किस हैसियत से निगमों को सप्लाई और वितरण के निर्देश दिए जा रहे हैं।

कानूनी ढाँचा उलझा नहीं है। 2003 के ट्रांसफर स्कीम के बाद उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन की भूमिका बल्क खरीद-बिक्री और होल्डिंग कंपनी की रह गई। बिजली खरीद के समझौते अक्सर वही करता है, फिर निगमों को सप्लाई करता है। वितरण, बिल, मीटर, कनेक्शन, उपभोक्ता—यह लाइसेंसधारी निगम का काम है।

हकीकत दूसरी है। स्मार्ट मीटर की ऊँची वसूली उ प्र पावर कॉरपोरेशन के निर्देश से निगमों में उतरी। नियामक दर नहीं थी, फिर भी सिंगल फेज पर ₹6,016 और थ्री फेज पर ₹11,341 लिए गए। 31 दिसंबर 2025 की कॉस्ट डाटा बुक में सही दाम ₹2,800 और ₹4,100 तय हुए। फर्क सिंगल फेज पर ₹3,216, थ्री फेज पर ₹7,241

6 मार्च 2026 को आयोग ने कहा—लौटाओ। अप्रैल में शुरू होना था। जुलाई-अगस्त तक आयोग फिर झिड़की दे रहा था कि क्रेडिट अधूरा है, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का ऐसा कैफ है कि उनके आदेश के बिना निदेशक तक सुनवाई पर नहीं पहुँते।

कंपनी बाद में करीब 92 हजार उपभोक्ताओं और ₹33 करोड़ की बात करती है। उपभोक्ता परिषद लाखों उपभोक्ता और ₹150–200 करोड़ का दावा करती है। दोनों आँकड़े एक साथ चलते हैं, विश्वास टूटता है।

उसी काल में ट्रांसफार्मर जलने पर दूसरा फरमान आया। अवैध रूप से अध्यक्ष पद पर बैठे डॉ. आशीष कुमार गोयल (आईएएस) के नीति-पत्र के बाद रेस्पो मुख्य अभियन्ता लखनऊ से निर्देश, फिर प्रयागराज क्षेत्र-द्वितीय का पत्र संख्या 5236 दिनांक 21 अगस्त 2026। खराबी का खर्च जेई-एई-एसई पर प्रतिशत में बाँट दो, नियम-10 का नोटिस काटो, तालिका भरकर बताओ कितने अधिकारियों पर चार्ज लगा। जो उपभोक्ता से मीटर का फालतू पैसा ले चुका, वही तंत्र अमले से मरम्मत का बिल माँग रहा है यह कैसा मजाक है ?

ऊपर आईएएस, नीचे अभियंता, बीच में प्रक्रिया

यह केवल मौजूदा परिपत्रों की कहानी नहीं। पूर्व चेयरमैन एम. देवराज (आईएएस, 1996 बैच) के कार्यकाल में यही ढाँचा और नंगा हुआ। जुलाई 2023 में उन्हें हटाकर प्राविधिक शिक्षा भेज दिया गया। चर्चाएं तो यहां तक कि उनके जाते ही संगठन और कर्मचारियों के चेहरे खिल गए मिठाई बांटी गई। यह राहत का प्रमाण नहीं, माहौल का संकेत है।

कार्रवाई हुई, यह सच है। ग्रेटर नोएडा अस्थाई कनेक्शन घोटाले में अधिशासी अभियंता, उपखंड अधिकारी और अवर अभियंता बर्खास्त किए गए। 53 लाख की हेराफेरी के आरोप में अवर अभियंता और लेखाकार हटाए गए। फर्रुखाबाद के एक एसडीओ को कार्यालय में ओसामा बिन लादेन की तस्वीर लगाने के मामले में सेवा से निकाल दिया गया। आधा दर्जन से अधिक बर्खास्तगी और दर्जनों निलंबन की खबरें उसी दौर की हैं। आधिकारिक भाषा इसे भ्रष्टाचार और अनुशासन कहती है।

सवाल “क्या कार्रवाई हुई” का नहीं है। सवाल यह है कि कार्रवाई किस हैसियत से और किस प्रक्रिया से हुई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने राकेश कुमार शर्मा मामले में यही आया। अनुशासन प्राधिकारी ने पहले निंदा प्रविष्टि, पाँच वेतन वृद्धि रोक और संवेदनशील पद न देने जैसा दंड दिया था। अपील लंबित थी। तब चेयरमैन देवराज ने विनियम 13 के अंतर्गत स्वतः संज्ञान लिया और दंड बढ़ाकर बर्खास्तगी कर दी।

अदालत ने पूछा—अपील का इंतजार किए बिना, अपीलीय प्राधिकारी की राय लिए बिना चेयरमैन अचानक क्यों घुसे और सजा क्यों चढ़ा दी। याचिकाकर्ता की दलील थी कि उस रूप में नोटिस का क्षेत्राधिकार ही नहीं था। यहीं “बिना अधिकार” वाला हिस्सा अदालती भाषा में टिकता है—हर फाइल पर नहीं, इस फाइल पर जरूर।

मार्च 2023 में ऊर्जा मंत्री ने 14 निदेशकों की चयन प्रक्रिया रद्द कर दी, जो उसी कार्यकाल में चली थी। कर्मचारी पक्ष की माँगों में एक माँग यह भी रही कि पावर कॉर्पोरेशन के चेयरमैन पद पर आईएएस न बैठाया जाए और चयन प्रक्रिया लागू की जाए । टकराव व्यक्तिगत नहीं, ढाँचे का था: तकनीकी सेवा का शीर्ष सामान्य प्रशासन के हाथ, निर्णय ऊपर, जोखिम नीचे।

पूरी गड़बड़ी केवल आईएएस की है—यह वाक्य अदालत की भाषा नहीं है। कुछ फाइलें घोटाले और राजस्व हेराफेरी से जुड़ी रहीं। लेकिन यह कहना गलत नहीं कि शीर्ष पर बैठे आईएएस अधिकारियों ने तकनीकी अमले की स्वायत्तता संकरी की, छोटी-बड़ी दोनों गलतियों पर एक जैसी सख्ती दिखाई, और जब प्रक्रिया लड़खड़ाई तो अदालत को पूछना पड़ा।

एक कलम, तीन कीमतें

आज वही कलम तीन जगह चलती है।

उपभोक्ता को मीटर का फालतू बिल मिला, रिफंड आयोग की झिड़की के बाद अधूरा-पूरा लौटा। कर्मचारी को ट्रांसफार्मर की खराबी पर प्रतिशत और बर्खास्तगी का डर मिला। निगम के पास लाइसेंस है, व्यवहार में अधीनस्थ दफ्तर जैसा बरताव है। तीनों का नतीजा एक ही जगह गिरता है—सरकार की छवि पर। जनता को अंतर नहीं दिखता कि आदेश उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन का है या डिस्कॉम का, चेयरमैन आईएएस हैं या अभियंता एमडी। उसे एक चेहरा दिखता है: बिल, नोटिस, वसूली।

बिजली तकनीकी काम है। मीटर का मानक बदला, पुरानी दर चस्पां कर दी गई। लाइसेंस निगम के नाम है, परिपत्र शक्ति भवन के लेटरपैड से निकलता है। आयोग मंजूरी देता है, कंपनी पहले वसूल लेती है। कोर्ट कहता है स्वतंत्र इकाई, दफ्तर व्यवहार में विभाग चलाता है। अनुभव फील्ड का है, फैसला पद का।

सुधार आयोग और अदालत बाद में करते हैं। तब तक उपभोक्ता बिल देख चुका होता है, अभियंता नोटिस पढ़ चुका होता है, और सड़क पर एक ही निष्कर्ष बैठ चुका होता है—फैसला अनुभव से नहीं, कुर्सी से हो रहा है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन शेयरधारक और खरीददार हो सकती है। वितरण लाइसेंसधारी वह 21 जनवरी 2010 के बाद नहीं है। जब वह निगमों को विभाग समझकर मीटर की दर लिखती है और अभियंता की कुर्सी हिलाती है, तब कानूनी सुधार का ढाँचा कागज़ पर रह जाता है।

घंटी गली में बँध चुकी है। आवाज़ सुधार की थी, गूँज यह निकली कि बिजली विभाग में अभियंता चलता नहीं—आईएएस चेयरमैन का आदेश चलता है। और वह आदेश अक्सर उस अनुभव से नहीं निकलता, जिसकी इस सेवा को दरकार है। खैर

 

युद्ध अभी शेष है

 

*अविजित आनन्द संपादक (समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र और विस्पर आफ अन्टोल्ड हिन्दी अंग्रेजी मासिक पत्रिका)*चन्द्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ*

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