*पिलर धंसा, इमारत झुकी और जाग गया एलडीए?*
*फाइलों में मजबूत महकमा, जमीन पर बिखरता सच!*
राजधानी लखनऊ में विकास प्राधिकरण को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने, तकनीक से जोड़ने और अवैध निर्माण पर शिकंजा कसने के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। शासन की ओर से विभाग को संसाधन भी मिले और अधिकारियों-कर्मचारियों की लंबी-चौड़ी व्यवस्था भी खड़ी की गई। मगर सवाल यह है कि जब निगरानी के लिए पूरा तंत्र मौजूद है तो फिर जमीन पर बेखौफ खड़े होते निर्माण आखिर किसकी नजर से बच जाते हैं?
वजीरगंज क्षेत्र में सोमवार को एस-ए अपार्टमेंट का मुख्य पिलर जमीन में धंसने और पांच मंजिला इमारत के एक ओर झुक जाने की घटना ने इस सवाल को और गहरा कर दिया। पिलर के क्षतिग्रस्त होने की सूचना मिलते ही इलाके में हड़कंप मच गया। इमारत में रह रहे करीब 25 परिवारों को आनन-फानन में बाहर निकाला गया। जिला प्रशासन, पुलिस, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंचीं। जनसुरक्षा को देखते हुए इमारत को खाली कराकर सील कर दिया गया।
एलडीए के अनुसार, वजीरगंज थानाक्षेत्र के वार्ड गोलागंज स्थित बारूदखाना में भूखण्ड संख्या 179/30च पर निर्मित एस-ए अपार्टमेंट के निर्माण के लिए वर्ष 2009 में मानचित्र स्वीकृति का आवेदन किया गया था। इसके बाद 12 अगस्त 2009 को परमिट संख्या 26520 के तहत भवन मानचित्र स्वीकृत किया गया। घटना की सूचना मिलने पर एलडीए सचिव सुशील प्रताप सिंह, अपर सचिव ज्ञानेन्द्र वर्मा तथा प्रवर्तन जोन-6 के जोनल अधिकारी प्रभाकर सिंह टीम के साथ मौके पर पहुंचे। सुरक्षा की दृष्टि से भवन को सील कर आवश्यक बचाव एवं सुरक्षा उपाय किए जा रहे हैं।
मगर सवाल सिर्फ एक पिलर के धंसने का नहीं है। सवाल उस पूरे निगरानी तंत्र का है, जिसके कंधों पर शहर में निर्माण गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी है।
वजीरगंज क्षेत्र में ही सील किए गए भवनों में कथित तौर पर दोबारा निर्माण शुरू होने और कई अन्य निर्माणों के जारी रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। मीणा ट्रांसपोर्ट के पास सील किए गए भवन को लेकर भी आरोप हैं कि सीलिंग के बाद निर्माण गतिविधियां फिर शुरू हो गईं। यदि ऐसा है तो सवाल यह है कि सीलिंग के बाद मौके की निगरानी कौन कर रहा है और सील तोड़ने या निर्माण जारी रखने की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंच रही?
इसी तरह लीपा-पोती क्षेत्र में निर्माण को अंतिम रूप दिए जाने की चर्चा हो, अस्तबल-चारबाग मोड़ पर कंपाउंडिंग की आड़ में निर्माण पूरा किए जाने का मामला हो या चिकमंडी मोड़ पर बेसमेंट सहित व्यावसायिक भवन के निर्माण की बात-इन तमाम मामलों में एक ही सवाल बार-बार सामने आता है कि आखिर प्रवर्तन तंत्र की निगाह कहां है?
अवध अपार्टमेंट के पीछे वाली गली में चल रहे निर्माण को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि संबंधित निर्माण स्वीकृत मानचित्र और नियमों के अनुरूप हैं तो विभाग के लिए स्थिति स्पष्ट करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो फिर कार्रवाई का इंतजार क्यों?
विडंबना देखिए कि अवैध निर्माण रोकने के लिए एलडीए में केवल एक-दो कर्मचारी नहीं हैं। जोनल अधिकारी, सहायक अभियंता, अवर अभियंता और प्रवर्तन से जुड़ा पूरा अमला मौजूद है। इसके अलावा सचिव, अपर सचिव और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था भी है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि इतने बड़े तंत्र के बावजूद कोई निर्माण नींव से लेकर मंजिलों तक पहुंच जाता है और विभाग को उसकी भनक कब लगती है-जब पिलर जवाब देने लगे?
वजीरगंज की घटना ने भवनों की सुरक्षा और रखरखाव का पहलू भी सामने ला दिया है। मौके पर मौजूद इसरार ने बताया कि वह चौथी मंजिल पर रहते हैं। उनके अनुसार भवन में मरम्मत की आवश्यकता की बात पहले से कही जा रही थी और लोगों से कुछ समय के लिए भवन खाली करने को भी कहा गया था। उन्होंने अपार्टमेंट की मेंटेनेंस और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
फिलहाल एलडीए ने इमारत को खाली कराकर सील कर दिया है और सुरक्षा के आवश्यक उपाय किए जा रहे हैं। लेकिन इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है-क्या शहर की निगरानी व्यवस्था खतरे को पहले पहचानती है या फिर हादसे का इंतजार करती है?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने विकास प्राधिकरणों को आधुनिक संसाधनों और तकनीक से मजबूत करने पर जोर दिया है। ऐसे में जरूरत सिर्फ आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी इस्तेमाल और जवाबदेही सुनिश्चित करने की भी है।
















