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चंबल की माटी से कैम्ब्रिज तक: इतिहास के पन्नों में भदावर के ‘युवराज’ की कलम विशेष आलेख: शंकर देव तिवारी 

चंबल की माटी से कैम्ब्रिज तक: इतिहास के पन्नों में भदावर के ‘युवराज’ की कलम

विशेष आलेख: शंकर देव तिवारी

चंबल की बीहड़ी कंदराओं और शौर्य की गाथाओं को समेटे बाह (आगरा) की ऐतिहासिक भदावर रियासत ने देश को राजा, राजनेता और योद्धा तो बहुतेरे दिए, लेकिन इसी माटी की कोख से निकले एक युवराज ने तलवार की जगह ‘कलम’ को अपना हथियार बनाया। हम बात कर रहे हैं भदावर राजघराने के वारिस, देश के जाने-माने युवा इतिहासकार और वैश्विक अकादमिक विद्वान डॉ. त्रिपुदमन सिंह भदावर की। वे देश के उन गिने-चुने इतिहासकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास को एक नई दृष्टि से प्रस्तुत किया है।

 

बाह की साहित्यिक चेतना और विरासत के प्रेरक

त्रिपुदमन सिंह का अकादमिक और बौद्धिक सफर अचानक नहीं शुरू हुआ, बल्कि इसके पीछे उनके पैतृक क्षेत्र बाह की समृद्ध बौद्धिक और भाषाई चेतना की एक अदृश्य पृष्ठभूमि रही है। भले ही उनका लालन-पालन राजसी वैभव में हुआ, लेकिन बाह की मिट्टी ने पत्रकारिता और साहित्य के जो महान हस्ताक्षर देश को दिए, उनका प्रभाव इस क्षेत्र के वैचारिक ताने-बाने पर हमेशा रहा है।

अखबारों और पत्रिकाओं की दुनिया में बाह का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराने वाले ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व संपादक आनंद जैन की पैनी पत्रकारिता, और हिंदी कहानी आंदोलन को नई दिशा देने वाली ‘सारिका’ पत्रिका के यशस्वी संपादक अवध नारायण मुद्गल की साहित्यिक समझ ने बाह को एक विशिष्ट बौद्धिक पहचान दी थी। इसी क्रम में, आंचलिक चेतना को शब्दों में ढालने वाले और क्षेत्र के महान मनीषी डॉक्टर राम गोपाल ‘दिनेश’ जैसे दिग्गजों ने जिस सांस्कृतिक और वैचारिक उर्वरता की नींव इस क्षेत्र में रखी, उसी प्रेरक क्रम और परंपरा की आधुनिक कड़ी के रूप में आज डॉ. त्रिपुदमन सिंह भदावर वैश्विक पटल पर उभर कर सामने आए हैं। पूर्वजों की बौद्धिक थाती को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इतिहास लेखन के माध्यम से बाह का गौरव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाया है।

 

चंबल के दिन बहुरने की नई अकादमिक अपेक्षा

लंबे समय तक चंबल और बाह के इस क्षेत्र को केवल दस्यु समस्या, बीहड़ और पिछड़ेपन के चश्मे से देखा जाता रहा। लेकिन डॉ. त्रिपुदमन सिंह की अंतरराष्ट्रीय सफलता—जैसे इतिहास के क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘डैन डेविड प्राइज 2024’ जीतना और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएच.डी करना—चंबल के लिए एक नए सूर्योदय जैसा है।

उनकी पहली पुस्तक ‘इंपीरियल सोवरनटी एंड लोकल पॉलिटिक्स’ सीधे तौर पर इसी चंबल की माटी के इतिहास से जुड़ी है, जिसमें उन्होंने भदौरिया राजपूतों के मुगलों और मराठों से संघर्ष और अपनी संप्रभुता बचाए रखने के इतिहास को दुनिया के सामने रखा। क्षेत्रीय पहचान को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि चंबल में केवल बंदूकों की गूंज नहीं, बल्कि कलम की धार भी है। आज बाह और चंबल की जनता को उनसे यह बड़ी अपेक्षा है कि वे अपनी बौद्धिक क्षमता और अंतरराष्ट्रीय पहुंच के जरिए इस ऐतिहासिक क्षेत्र के दिन बहुरने (पुनरुत्थान) का मार्ग प्रशस्त करेंगे, ताकि यह क्षेत्र शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक पर्यटन के एक बड़े केंद्र के रूप में देश के मानचित्र पर चमक सके।

 

नेहरू और भारतीय संविधान पर साहसिक और अधिकृत लेखन

एक इतिहासकार के रूप में डॉ. त्रिपुदमन सिंह ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की बड़ी ही तार्किक और अधिकृत समीक्षा की है। उनकी चर्चित पुस्तक ‘सिक्सटीन स्टॉर्मी डेज’ (हिंदी अनुवाद: वे सोलह दिन) भारतीय संविधान के पहले संशोधन (1951) पर लिखा गया एक बेहतरीन दस्तावेज है। इसके जरिए उन्होंने बेबाकी से यह उजागर किया कि कैसे नेहरू सरकार ने अपनी नीतियों को लागू करने के लिए देश के नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार जैसी मूल आजादियों को सीमित कर दिया था। इसके बाद अदील हुसैन के साथ मिलकर लिखी उनकी किताब ‘नेह्रू: द डिबेट्स दैट डिफाइंड इंडिया’ में उन्होंने नेहरू और उनके समकालीन नेताओं (जैसे पटेल, जिन्ना, मुखर्जी) के बीच हुए वैचारिक टकरावों को प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ सामने रखकर इतिहास के कई धुंधले पन्नों को साफ किया है।

 

संक्षिप्त जीवन-वृत्त (एक नज़र में)

नाम: डॉ. त्रिपुदमन सिंह भदावर

जन्म: 26 जून 1988 (आगरा, उत्तर प्रदेश)

पारिवारिक पृष्ठभूमि: पिता राजा महेंद्र अरिदमन सिंह (पूर्व कैबिनेट मंत्री, यूपी) एवं माता रानी पक्षालिका सिंह (विधायक, बाह)।

शिक्षा: सेंट पीटर्स कॉलेज (आगरा), वारविक यूनिवर्सिटी (यूके) से स्नातक, और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (यूके) से एम.फिल व इतिहास में पीएच.डी।

वर्तमान स्थिति: स्विट्जरलैंड के प्रतिष्ठित ‘जिनेवा ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट’ में अंबीजियोने फेलो (Ambizione Fellow) और वरिष्ठ शोधकर्ता। ब्रिटेन की रॉयल हिस्टोरिकल सोसाइटी के सम्मानित फेलो।

प्रमुख कृतियाँ: सिक्सटीन स्टॉर्मी डेज (वे सोलह दिन), नेहरू: द डिबेट्स दैट डिफाइंड इंडिया, इंपीरियल सोवरनटी एंड लोकल पॉलिटिक्स।

चंबल की माटी से निकलकर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अपनी मेधा का लोहा मनवाने वाले डॉ. त्रिपुदमन सिंह भदावर आज की युवा पीढ़ी और विशेषकर ग्रामीण अंचल के युवाओं के लिए एक बड़े रोल मॉडल हैं।

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