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राजनीति: सेवा बनेगी या व्यवसाय ही बनी रहेगी?* _नवीन प्रकाश सिंह

*राजनीति: सेवा बनेगी या व्यवसाय ही बनी रहेगी?*

 

_नवीन प्रकाश सिंह।

आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि राजनीति आखिर सेवा है या व्यवसाय?

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में राजनीति त्याग, संघर्ष, विचार और राष्ट्र निर्माण का माध्यम थी। उस समय नेताओं की पहचान उनकी संपत्ति से नहीं, बल्कि उनके चरित्र, संघर्ष और समाज के प्रति समर्पण से होती थी। राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि जनता की सेवा करना था।

लेकिन आज राजनीति का स्वरूप काफी बदल चुका है। राजनीति अब एक ऐसे क्षेत्र में बदलती जा रही है जहाँ पद, शक्ति, प्रभाव, संरक्षण और आर्थिक लाभ प्रमुख आकर्षण बन गए हैं। चुनावों में बढ़ता खर्च, धनबल और बाहुबल का प्रभाव, तथा जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण ने राजनीति को आम नागरिक की पहुँच से दूर कर दिया है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि देश में एक चपरासी, शिक्षक, क्लर्क, अधिकारी, न्यायिक सेवा, सेना या प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए परीक्षा और योग्यता अनिवार्य है। देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में प्रवेश के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) जैसी कठोर परीक्षा देनी पड़ती है। लेकिन विडंबना यह है कि ग्राम प्रधान से लेकर सांसद, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक बनने के लिए किसी प्रकार की शैक्षणिक, प्रशासनिक या संवैधानिक योग्यता परीक्षा अनिवार्य नहीं है।

जब देश का प्रशासन चलाने वाले अधिकारियों की योग्यता परीक्षा से तय होती है, तो देश और समाज की दिशा तय करने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए भी पदानुसार योग्यता परीक्षण क्यों न हो?

समय आ गया है कि ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत अध्यक्ष, महापौर, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों के लिए चरणबद्ध एवं पदानुसार अनिवार्य परीक्षा व्यवस्था लागू की जाए। इस परीक्षा में संविधान, लोकतंत्र, प्रशासन, वित्तीय प्रबंधन, कानून, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय सुरक्षा, स्थानीय शासन और नैतिक नेतृत्व जैसे विषय शामिल होने चाहिए।

इसके लिए देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, संवैधानिक विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों और आवश्यकता पड़ने पर विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों एवं अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया जा सकता है। राजनीति केवल लोकप्रियता का नहीं, बल्कि क्षमता और ज्ञान का भी विषय होना चाहिए।

लोकतंत्र में जनता का अधिकार सर्वोपरि है, लेकिन जनता को योग्य विकल्प मिलना भी उतना ही आवश्यक है। यदि राजनीति में प्रवेश के लिए न्यूनतम ज्ञान, प्रशिक्षण और योग्यता सुनिश्चित हो जाए, तो भ्रष्टाचार, अवसरवाद और अयोग्यता पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।

राजनीति को गाली देने से व्यवस्था नहीं बदलेगी। व्यवस्था तब बदलेगी जब राजनीति में अच्छे, शिक्षित, संवेदनशील और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले लोग आएँगे। और यह तभी संभव होगा जब राजनीति को केवल चुनाव जीतने की कला नहीं, बल्कि राष्ट्र संचालन की जिम्मेदारी माना जाएगा।

जिस दिन राजनीति में पारदर्शिता, योग्यता, जवाबदेही और सेवा भाव को प्राथमिकता मिलेगी, उस दिन राजनीति फिर से व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का सर्वोच्च माध्यम बन जाएगी। तब सत्ता लक्ष्य नहीं होगी, बल्कि समाज और देश के विकास का साधन होगी। यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।

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