साहित्य एवं पत्रकारिता का अटूट सम्बन्ध, आलेख बलराम सरस

 

 

*साहित्य एवं पत्रकारिता का अटूट सम्बन्ध*।

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साहित्य और पत्रकारिता किसी भी समाज व राष्ट्र की प्रगति के मुख्य आधार होते हैं जिनके बिना एक स्वस्थ, सजग और प्रगतिशील समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। 30 मई 1826 को जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिंदी के प्रथम समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन शुरू किया, तब भारतीय जनमानस में एक नए वैचारिक युग का प्रारंभ हुआ था। यही ऐतिहासिक दिन आज पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। यदि पत्रकारिता की पृष्ठ भूमि को देखा जाए तो स्पष्ट होता कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म ही साहित्य की कोख से हुआ था। यद्यपि आज साहित्य और पत्रकारिता की प्रकृति, कार्यशैली और तात्कालिकता में अंतर दिखाई देता है, किंतु दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है—लोकमंगल यानी समाज का कल्याण। जब पत्रकारिता में साहित्य की संवेदनशीलता, रचनात्मकता और भाषाई सौंदर्य का समावेश होता है, तो समाचार केवल एक घटना न रहकर सीधे पाठक के अंतःकरण को झकझोर देता है। साहित्य और पत्रकारिता के इस अटूट संबंध को रेखांकित करती ये पंक्तियाँ आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं:

एक संजोता कला-भावना, दूजा लड़ता अधिकारों को,

दोनों मिलकर धार बदलते, सोए हुए विचारों को।”

भारत का स्वतंत्रता संग्राम इस बात का जीता जागता प्रमाण है कि साहित्य और पत्रकारिता कभी एक-दूसरे से विलग नहीं रहे। भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण भट्ट, गणेश शंकर विद्यार्थी और मुंशी प्रेमचंद जैसे युगपुरुष मूलतः साहित्यकार थे, जिन्होंने पत्रकारिता को समाज सुधार का माध्यम बनाया। उन्होंने ‘कविवचनसुधा’, ‘सरस्वती’, ‘कर्मवीर’, ‘प्रताप’ और ‘हंस’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से देश में न केवल साहित्यिक चेतना का विस्तार किया अपितु पराधीन भारत की सोई हुई जनता में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की। माखनलाल चतुर्वेदी जी की ये पंक्तियाँ पत्रकारिता और साहित्य के इसी क्रांतिकारी और त्यागमयी स्वरूप को उद्घाटित करती हैं:

“द्वार बलि का खोल चल भूडोल चल,

एक खंडन के लिए सौ-सौ सृजन चल

समाचार पत्र की पहुँच जन-सामान्य तक होती है अतः साहित्य को उसके पाठकों तक पहुँचाने का सबसे उपयुक्त माध्यम पत्रकारिता ही है। समाचार पत्रों के साहित्यिक परिशिष्टों ने ही देश को बड़े-बड़े कवि और लेखक दिए हैं।

पत्रकारिता यदि ‘आज का इतिहास’ लिखती है, तो साहित्य उस इतिहास को संवेदनात्मक रूप से अमर और जीवंत बनाता है। पत्रकारिता तात्कालिक यथार्थ का दस्तावेज है, तो साहित्य सनातन सत्य का शिलालेख। यदि पत्रकारिता का यह माध्यम न हो, तो गंभीर साहित्य केवल पुस्तकालयों की अलमारियों और साहित्यिक संगोष्ठियों तक ही सीमित रह जाएगा।

वर्तमान आर्थिक युग में पत्रकारिता एक तरफ अपनी भाषाई गरिमा और साख खोती जा रही है। वहीं दूसरी ओर, समकालीन साहित्य भी सामाजिक सरोकारों से दूर होता हुआ आम जनता की समस्याओं से कटकर कुछ खास विमर्शों तक सिमटता दिख रहा है। आज के समय में इन दोनों विधाओं को अपने मूल की ओर लौटने की आवश्यकता है। पत्रकारिता को अपनी विश्वसनीयता बहाल करने के लिए साहित्यिक मूल्यों, नैतिकता और गंभीरता को अपनाना होगा; वहीं साहित्य को प्रासंगिक बने रहने के लिए पत्रकारिता की तरह जन-सरोकारों से सीधे जुड़ना होगा।

हिंदी पत्रकारिता दिवस के इस अवसर पर हमें यह दृढ़ता से स्वीकार करना होगा कि समाज को वैचारिक रूप से समृद्ध और लोकतांत्रिक बनाए रखने के लिए इन दोनों विधाओं का सह-अस्तित्व अनिवार्य है। इस विषय पर निम्न पंक्तियाँ सार्थक लगतीं हैं –

कलम अगर रुक जाएगी, तो सो जाएगी तरुणाई,

साहित्य और पत्रकारिता ने, युग-युग की अलख जगाई।

एक लिखे इतिहास नया, एक वर्तमान को संवारे,

इन दोनों के संगम से ही, मिटते जग के अंधियारे।”

▪️ बलराम सरस

स्वतंत्र लेखक/कवि

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