समाधान दिवस के दावों पर उठे सवाल, शिकायतों के निस्तारण और अवैध कब्जों को लेकर प्रशासन पर निशाना, रिपोर्ट शिवम् सोलंकी

समाधान दिवस के दावों पर उठे सवाल, शिकायतों के निस्तारण और अवैध कब्जों को लेकर प्रशासन पर निशाना

एटा। जिले में नए जिलाधिकारी के कार्यभार संभालने के बाद अब तक कितनी शिकायतों का निस्तारण हुआ और कितनी शिकायतें लंबित हैं, इसकी स्पष्ट जानकारी आम जनता को उपलब्ध नहीं है। समाधान दिवस के अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान और पारदर्शी व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत को लेकर सवाल उठने लगे हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक दावों और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उनका आरोप है कि बंद कमरों में बैठकर तैयार की जाने वाली रिपोर्टों और पोर्टलों पर अपलोड की जाने वाली आख्या की वास्तविकता का स्वतंत्र सत्यापन कराया जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।नागरिकों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि शिकायतों के निस्तारण और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का स्थलीय निरीक्षण कराया जाए। उनका सुझाव है कि उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति अथवा स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से जांच कराई जाए, जिससे वास्तविक स्थिति का आकलन हो सके।आरोप है कि गांवों, परगनों और तहसीलों में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों की समस्या लगातार बढ़ रही है। लोगों का कहना है कि रास्ते, तालाब, हरिजन आबादी, सामान्य आबादी, खलिहान, खाद गड्ढों तथा अन्य बंजर भूमि पर कब्जों के मामलों में प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है। इससे सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति और सुशासन के दावों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।हालांकि प्रशासन का कहना है कि जन शिकायतों के निस्तारण और अवैध कब्जों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। वहीं स्थानीय नागरिकों का मानना है कि वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन ही प्रशासनिक दावों की सच्चाई सामने ला सकता है।

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