*सत्ता, तंत्र और जन-विश्वास: बिहार में जंगलराज की वापसी और संवैधानिक संकट*
*राष्ट्रपति शासन: एकमात्र संवैधानिक विकल्प,*
नई दिल्ली।
लोकतंत्र का आधार ‘जनता’ है, ‘प्रशासन’ उसका क्रियान्वयन करने वाला अंग है, और ‘कर’ (टैक्स) वह ईंधन है जो इस पूरे तंत्र को गति प्रदान करता है। आज बिहार में ये तीनों ही स्तंभ एक भयावह और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं।
बिहार में कानून-व्यवस्था का पतन और जन-आक्रोश
बिहार में जिस प्रकार से कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, उससे जनता का शासन तंत्र से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है। करदाता के रूप में जनता सुरक्षा और सुशासन की अपेक्षा करती है, लेकिन बदले में उसे ‘पुलिसिया दमन’ और ‘राजनीतिक अराजकता’ मिल रही है। यह स्पष्ट है कि राज्य में कानून का शासन समाप्त हो चुका है और अपराधी-पुलिस गठजोड़ का बोलबाला है।
भरत भूषण तिवारी की हत्या: एक ‘सुनियोजित षड्यंत्र’
भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल कोर कमेटी) ने बिहार की बिगड़ी कानून व्यवस्था और जनता के बढ़ते असंतोष को गंभीरता से संज्ञान में लिया है। संगठन के संस्थापक एके बिंदुसार एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बालकृष्ण तिवारी ने संयुक्त रूप से कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि भरत भूषण तिवारी का प्रकरण कोई सामान्य एनकाउंटर नहीं है।
संगठन के नेतृत्व का मानना है कि यह एक ‘सुनियोजित राजनीतिक हत्या’ है।
भरत भूषण तिवारी एक क्रांतिकारी थे जो भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, और उनकी आवाज को दबाने के लिए सत्ता ने अपनी ताकत का दुरुपयोग किया है।
इस घटना में राज्य सरकार की संलिप्तता स्पष्ट रूप से साबित होती है, जिसने कानून के रक्षक को ही भक्षक बना दिया है।
राष्ट्रपति शासन: एकमात्र संवैधानिक विकल्प,
बिहार की वर्तमान परिस्थितियाँ इस बात की गवाही दे रही हैं कि यहाँ संवैधानिक मशीनरी पूरी तरह विफल हो चुकी है। भारतीय मीडिया फाउंडेशन की कोर कमेटी का स्पष्ट मत है कि ऐसे वातावरण में जहाँ निर्दोषों की आवाज को गोलियों से शांत किया जा रहा हो, वहां राज्य सरकार को शासन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
संगठन की प्रमुख मांगें:
बिहार में तत्काल प्रभाव से राष्ट्रपति शासन लागू किया जाए।
भरत भूषण तिवारी की सुनियोजित हत्या के पूरे प्रकरण की एक उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच कराई जाए।
उन सभी चेहरों को बेनकाब किया जाए जिन्होंने इस षड्यंत्र की पटकथा लिखी है।
लोकतंत्र में ‘भय’ का कोई स्थान नहीं है। यदि रक्षक ही षड्यंत्रकारी बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? भारतीय मीडिया फाउंडेशन, बिहार की जनता की भावनाओं और सुरक्षा की मांग का पुरजोर समर्थन करता है। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार हस्तक्षेप करे और बिहार में पुनः संवैधानिक मर्यादाओं को स्थापित करने हेतु राष्ट्रपति शासन के कठोर कदम उठाए।
कानून से ऊपर कोई नहीं है, और यह हत्या लोकतंत्र के चेहरे पर एक ऐसा दाग है जिसे केवल पूर्ण निष्पक्ष जांच और सख्त प्रशासनिक सुधार से ही धोया जा सकता है।









