ऑपरेशन कायाकल्प’ या कागजी मायाजाल? सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी पड़ताल* लेखक: ए.के. बिंदुसार (संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन) नेशनल कोर कमेटी

*’ऑपरेशन कायाकल्प’ या कागजी मायाजाल? सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी पड़ताल*

लेखक: ए.के. बिंदुसार (संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन) नेशनल कोर कमेटी।

उत्तर प्रदेश में ‘ऑपरेशन कायाकल्प’ के नाम पर सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाने का जो ढोल पीटा जा रहा है, वह एक ओर तो विकास की गाथा सुनाता है, लेकिन दूसरी ओर व्यवस्था के भीतर व्याप्त सड़ांध को भी उजागर करता है। भारतीय मीडिया फाउंडेशन (BMF) नेशनल कोर कमेटी की यह जिम्मेदारी है कि हम सत्ता के दावों और समाज की हकीकत के बीच के उस फासले को पाटें, जहाँ आज भी गरीब का बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है।

दावों का सच और सुविधाओं का अभाव

सरकार का आधिकारिक आंकड़ा कहता है कि प्रदेश के लगभग 95% से अधिक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में ‘स्मार्ट’ सुविधाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। लेकिन क्या स्मार्ट बोर्ड, टाइल्स और रंग-रोगन ही ‘शिक्षा’ है? हकीकत यह है कि सुदूर ग्रामीण अंचलों में ‘स्मार्ट क्लास’ का मतलब केवल एक धूल फांकता प्रोजेक्टर है, जिसके पास न तो निरंतर बिजली है और न ही उसे चलाने वाला प्रशिक्षित शिक्षक। फर्नीचर की फाइलों में तो शत-प्रतिशत संतृप्ति हो गई है, परंतु आज भी सरकारी स्कूलों के प्रांगण में बच्चों को जमीन पर बैठकर अपनी तकदीर लिखते देखा जा सकता है।

शिक्षक विहीन विद्यालय: शिक्षा का सबसे बड़ा संकट

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत तय मानक (शिक्षक-छात्र अनुपात) का खुला उल्लंघन हो रहा है। अधिकांश सरकारी स्कूलों में दो या तीन शिक्षकों के भरोसे पांच कक्षाएं चल रही हैं। जब शिक्षक ही नहीं होंगे, तो कायाकल्प का रंग-रोगन बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल कैसे करेगा? यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का एक जीता-जागता उदाहरण है।

पत्रकारिता का दायित्व: जनता को जगाने का समय

भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के सभी पदाधिकारियों और स्वतंत्र पत्रकारों से मेरा आह्वान है कि वे इस ‘कागजी विकास’ के खिलाफ अपनी कलम को हथियार बनाएं। हमें केवल प्रेस रिलीज प्रकाशित नहीं करनी है, बल्कि हमें ‘ग्राउंड जीरो’ पर जाकर उन स्कूलों की पोल खोलनी है जिन्हें ‘आदर्श’ घोषित किया गया है, लेकिन हकीकत में वे बदहाल हैं।

हमारी मांग और संकल्प:

पारदर्शिता: सरकार ‘कायाकल्प’ के नाम पर खर्च हुए धन का सार्वजनिक ऑडिट (Social Audit) करवाए।

शिक्षकों की भर्ती: रिक्त पदों को अविलंब भरा जाए, ताकि छात्र-शिक्षक अनुपात का मानक पूरा हो।

जवाबदेही: जो स्कूल कागजों पर स्मार्ट हैं और धरातल पर जर्जर, उनके खिलाफ सख्त विभागीय जांच हो।

बीएमएफ का स्पष्ट मानना है कि यदि भारत को विश्व गुरु बनना है, तो आधारशिला (सरकारी स्कूल) को मजबूत करना होगा। हम किसी की आलोचना नहीं कर रहे, हम व्यवस्था के सुधार के लिए आईना दिखा रहे हैं। जो सरकार जनता के कर (Tax) के पैसों से चल रही है, उसे यह बताना ही होगा कि अंतिम पंक्ति में खड़े बच्चे को सही शिक्षा क्यों नहीं मिल रही?

याद रखें—हमारा उद्देश्य सिर्फ खबर चलाना नहीं, बल्कि उस खबर का परिणाम लाना है। बदलाव की यह मशाल अब रुकनी नहीं चाहिए।

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