​पंचायत का अपहरण—क्या प्रशासक की नियुक्ति संविधान का सीधा उल्लंघन है?

*​पंचायत का अपहरण—क्या प्रशासक की नियुक्ति संविधान का सीधा उल्लंघन है?*

*ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करना लोकतंत्र का गला घोटना*

 

​लेखक: ए.के. बिंदुसार (संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन)

 

नई दिल्ली:

​उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में हो रही देरी और ग्राम प्रधानों के कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें ‘प्रशासक’ बनाने का सरकारी निर्णय, लोकतंत्र के लिए एक बड़ा संकट बन गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ की नाराजगी उस दर्द को बयां करती है जो भारतीय संविधान की आत्मा को चोट पहुँचा रहा है।

​संवैधानिक प्रावधान क्या कहते हैं?

​भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-E (Article 243-E) के तहत यह स्पष्ट प्रावधान है:

​प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पांच वर्ष होगा।

​पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नए चुनाव हो जाने चाहिए।

​अनुच्छेद 243-E(3) के अनुसार, पंचायत के विघटन की स्थिति में चुनाव छह महीने की अवधि के भीतर हो जाने चाहिए।

​संवैधानिक उल्लंघन का प्रश्न: संविधान में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि चुनी हुई पंचायत का कार्यकाल खत्म होने के बाद उसे प्रशासनिक अधिकारियों या पूर्व प्रधानों को ‘प्रशासक’ बनाकर लंबे समय तक चलाया जाए। प्रशासक की नियुक्ति केवल एक ‘अस्थायी आपातकालीन व्यवस्था’ हो सकती है, न कि ‘दीर्घकालिक नीति’। जब चुनाव समय पर कराना सरकार की जिम्मेदारी है, तो उस विफलता की सजा जनता को ‘बिना जनप्रतिनिधि की पंचायत’ के रूप में क्यों दी जा रही है?

​प्रशासक की नियुक्ति: लोकतंत्र का गला घोंटना

​संविधान निर्माताओं ने त्रि-स्तरीय पंचायत राज की परिकल्पना ‘स्वशासन’ (Self-Governance) के लिए की थी, ‘प्रशासन’ के लिए नहीं। जब कोई प्रशासक नियुक्त होता है, तो वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होता, बल्कि वह उच्च अधिकारियों के इशारे पर काम करता है। यह ग्राम स्वराज की अवधारणा पर प्रहार है। यदि सरकार चुनाव नहीं करा पा रही है, तो यह उसकी ‘संवैधानिक विफलता’ है, जिसे कार्यकाल विस्तार या प्रशासक की नियुक्ति से नहीं ढंका जा सकता।

​सरकार के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं?

​अक्सर सवाल उठता है कि यदि यह संविधान का उल्लंघन है, तो सरकार के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती? इसका कारण हमारी कानून व्यवस्था की जटिलता है:

​न्यायिक मर्यादा: न्यायालय सीधे सरकार को बर्खास्त नहीं कर सकता। वह केवल निर्देशों, आदेशों और संवैधानिक व्याख्या के माध्यम से सरकार को ‘सुधार’ का मौका देता है।

​राजनीतिक बचाव: सरकारें अक्सर ‘कोविड’, ‘आरक्षण विवाद’ या ‘परिसीमन’ जैसे तकनीकी बहानों का सहारा लेकर न्यायालयों में समय मांग लेती हैं।

​जनचेतना का अभाव: जब तक जनता स्वयं अपनी चुनी हुई सरकार से ‘चुनाव’ की मांग सड़क पर नहीं करती, तब तक सरकारें इस संवैधानिक रिक्तता (Constitutional Vacuum) का लाभ उठाती रहती हैं।

​भारतीय मीडिया फाउंडेशन (BMF) नेशनल कोर कमेटी का संकल्प,

​हम यह मांग करते हैं कि:

​स्वतंत्र चुनाव आयोग की सक्रियता: राज्य निर्वाचन आयोग को सरकार के दबाव से मुक्त होकर चुनाव की घोषणा करनी चाहिए।

​दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: यदि समय पर चुनाव नहीं हुए, तो उन अधिकारियों और नीति-निर्धारकों के खिलाफ ‘लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन’ का मुकदमा चलना चाहिए।

​संवैधानिक ऑडिट: हम भारत के सर्वोच्च न्यायालय से मांग करते हैं कि ऐसे मामलों में ‘स्वत: संज्ञान’ (Suo Motu) लिया जाए ताकि कोई भी सरकार संवैधानिक प्रावधानों को मजाक न बना सके।

यूनियन के संस्थापक एके बिंदुसार ने कहा कि हमारा संविधान कोई किताब नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीवन रेखा है। यदि प्रधानों के कार्यकाल के बाद प्रशासक बिठाने का सिलसिला चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब पंचायतें केवल सरकारी दफ्तर बनकर रह जाएंगी। अब समय आ गया है कि जनता और मीडिया मिलकर सत्ता को यह याद दिलाएं— ‘संविधान से ऊपर कोई नहीं, और चुनाव से ऊपर कोई बहाना नहीं।’

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