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खाकी’ और ‘खास’ के बीच पिसी आम जनता, थानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराने का समय

विशेष संपादकीय:
*’खाकी’ और ‘खास’ के बीच पिसी आम जनता, थानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराने का समय*

Special Editorial Report- Chief Editor City to Village- Rammilan Jaiswal,

लेखक-एके बिंदुसार, संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल कोर कमेटी),

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘जीरो टॉलरेंस’ का संकल्प आज प्रदेश की कानून-व्यवस्था का आधार स्तंभ है। शासन का स्पष्ट निर्देश है कि प्रदेश ‘भयमुक्त और भ्रष्टाचार मुक्त’ हो। किंतु, जब हम जमीनी हकीकत का अवलोकन करते हैं, तो एक कड़वा सच सामने आता है। आज राज्य के अधिकांश थानों में फरियादियों की पीड़ा सुनने के बजाय, बिचौलियों और दलालों का एक ऐसा सिंडिकेट सक्रिय है, जो यह तय कर रहा है कि किसकी एफआईआर लिखी जाएगी और किसके साथ ‘सेटिंग’ की जाएगी।
*थाने में बिचौलियों का ‘रिमोट कंट्रोल’*
आज थानों की कार्यप्रणाली में ‘पैसे का खेल’ स्पष्ट दिखाई दे रहा है। बिना किसी योग्यता या पहचान के तथाकथित पत्रकार और दलाल थानेदारों के कक्षों में बैठकर प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासन की छवि धूमिल कर रही है, बल्कि निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों तथा समाजसेवियों के सम्मान पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही है। क्या हम एक ऐसे तंत्र की कल्पना कर सकते हैं जहाँ थाने केवल अपराधियों के लिए भय का स्थान हों, न कि आम जनता के लिए शोषण का अड्डा?
*पुलिस सुधार: केवल वेतन वृद्धि नहीं, ‘सिस्टम’ में सुधार की दरकार*
अक्सर यह चर्चा होती है कि पुलिसकर्मियों के वेतन-भत्तों में वृद्धि की जाए और उन्हें आधुनिक हथियारों से लैस किया जाए। हमारा स्पष्ट मानना है कि संसाधनों की कमी सुधार की आड़ नहीं हो सकती। हाँ, पुलिस का वेतन-भत्ता सम्मानजनक होना चाहिए ताकि उनका मनोबल ऊँचा रहे, लेकिन संसाधन तभी प्रभावी होते हैं जब वे ‘नैतिकता’ और ‘जवाबदेही’ के साथ जुड़ें। अत्याधुनिक हथियारों से अधिक आज पुलिस को ‘आधुनिक सोच’ और ‘डिजिटल निगरानी’ की आवश्यकता है।
*सुधार का रोडमैप: पाँच ठोस स्तंभ*
पुलिस कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के लिए शासन को निम्नलिखित बिंदुओं पर ‘डिजिटल स्ट्राइक’ करने की आवश्यकता है:
सीसीटीवी की अनिवार्य लाइव मॉनिटरिंग: थानाध्यक्ष के कक्ष से लेकर गेट तक हर कोने में एचडी सीसीटीवी कैमरे हों, जिनका सीधा फीड जिला मुख्यालय और लखनऊ स्थित पुलिस मुख्यालय से जुड़ा हो। कैमरे बंद होना ‘तकनीकी खराबी’ नहीं, बल्कि अपराध माना जाए।
बिचौलियों और छद्म पत्रकारों पर प्रतिबंध: थानों में अनावश्यक बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित हो। मान्यता प्राप्त और अधिकृत पत्रकारों की ही सूची संज्ञान में ली जाए ताकि पत्रकारिता की गरिमा बची रहे।
पारदर्शी जनसुनवाई और ऑडिट: प्रत्येक प्रार्थना पत्र का ऑनलाइन पंजीकरण हो। मुख्यालय स्तर से पीड़ितों को रैंडम कॉल कर फीडबैक लिया जाए कि क्या उनसे कोई आर्थिक मांग की गई थी।
LIU की ‘इंटरनल विजिलेंस’ भूमिका: स्थानीय अभिसूचना इकाई को निर्देश दिए जाएं कि वे थाने में सक्रिय दलालों और भ्रष्ट पुलिसकर्मियों की गोपनीय रिपोर्ट सीधे उच्चाधिकारियों को दें, जिस पर समयबद्ध दंडात्मक कार्रवाई हो।
थाने का ‘सोशल ऑडिट’: पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक स्वतंत्र समिति द्वारा थानों की कार्यप्रणाली का औचक निरीक्षण और मूल्यांकन कराया जाए।

पुलिस व्यवस्था में सुधार केवल वर्दी का डर दिखाकर नहीं, बल्कि आम जनता और पुलिस के बीच ‘विश्वास का सेतु’ बनाकर लाया जा सकता है। थानों को यदि इन ‘सफेदपोश’ बिचौलियों के चंगुल से मुक्त नहीं किया गया, तो सरकार के ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ अभियान की राह में ये दलाल सबसे बड़ी चुनौती बने रहेंगे। समय आ गया है कि पुलिसिंग को ‘बिचौलिया मुक्त’ बनाकर इसे वास्तव में ‘लोक-हित’ का प्रहरी बनाया जाए।
लेखक भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक हैं और लगातार पत्रकारिता की गरिमा एवं जन-हितैषी प्रशासन के लिए संघर्षरत हैं।

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