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बेजान नियम, मृत संवेदनाएं और अस्थियों में न्याय तलाशता भारत, आलेख शंकर देव तिवारी

बेजान नियम, मृत संवेदनाएं और अस्थियों में न्याय तलाशता भारत

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ओडिशा के क्योंझर की माटी से उठी एक चीख ने देश के उन तमाम दावों की चूलें हिला दी हैं, जो हम ‘अंत्योदय’ और ‘समावेशी विकास’ के नाम पर करते आए हैं। एक आदिवासी भाई, जीतू मुंडा, अपनी मृत बहन के कंकाल के अवशेषों को बैंक के काउंटर पर रख देता है—यह दृश्य इक्कीसवीं सदी के भारत की सबसे वीभत्स और शर्मनाक तस्वीरों में से एक के रूप में दर्ज किया जाएगा। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह उस ‘सिस्टम’ का सामूहिक नैतिक पतन है, जिसे हमने इंसान की सेवा के लिए बनाया था, लेकिन जो अब खुद इंसान को निगलने पर आमादा है।

 

## नियमों की वेदी पर चढ़ती इंसानियत

 

घटना की परतें उधेड़ें तो रूह काँप जाती है। जीतू की बहन की मृत्यु दो महीने पहले हुई। उसके खाते में जमा ₹19,300 की वह राशि किसी बड़े शहर के रईस के लिए शायद एक शाम के जश्न का खर्च हो, लेकिन एक गरीब आदिवासी परिवार के लिए वह ‘जीवन की डोर’ थी। बैंक के बेजान नियमों ने एक ही रट लगा रखी थी— “खाताधारक को खुद आकर हस्ताक्षर करने होंगे।”

 

क्या बैंक के उन अधिकारियों की आँखों पर चढ़ा ‘नियमों का चश्मा’ इतना मोटा हो चुका था कि उन्हें एक भाई की बेबसी और मृत्यु की कड़वी सच्चाई नहीं दिखी? जब जीतू ने बार-बार कहा कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है, तब भी संवेदना की एक लहर तक नहीं उठी। अंततः, एक भाई को अपनी मर्यादा और अपनी बहन की पवित्र स्मृति को ताक पर रखकर उसके कंकाल को गवाह के रूप में पेश करना पड़ा। यह उस व्यवस्था पर सबसे तीखा प्रहार है जो कागज़ को जीवित मानती है और जीवित इंसान को महज़ एक ‘डाटा’ या ‘नंबर’।

 

## दो भारत: एक खास के लिए, एक आम के लिए

 

यह घटना भारत के भीतर मौजूद ‘दो समाजों’ की खाई को उजागर करती है।

 

* एक तरफ वह भारत है जहाँ हज़ारों करोड़ के कर्जदार और घोटालेबाज बैंकों के पिछले दरवाजे से निकलकर सात समंदर पार सुरक्षित पहुँच जाते हैं। उनके लिए नियम लचीले हो जाते हैं, उनके लिए कानूनी प्रक्रियाएं रातों-रात मोड़ दी जाती हैं।

* दूसरी तरफ वह भारत है जहाँ जीतू मुंडा जैसे लोगों को अपने ही हक के चंद रुपयों के लिए मृत्यु का वीभत्स प्रदर्शन करना पड़ता है।

 

क्या हमारी बैंकिंग प्रणाली और नौकरशाही केवल शिक्षित और रसूखदारों के लिए ‘यूजर फ्रेंडली’ है? क्या एक गरीब की भाषा और उसके आंसू हमारे ‘सिस्टम’ के सॉफ्टवेयर में फिट नहीं बैठते? जीतू मुंडा का अपमान दरअसल उस हर नागरिक का अपमान है जो कतार में सबसे पीछे खड़ा है।

 

## विकास की चमक और संवेदनाओं का अंधेरा

 

हम आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का गौरव मना रहे हैं। हम चांद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहरा चुके हैं। लेकिन जीतू मुंडा की यह पोटली सवाल करती है कि इस तकनीक और तरक्की का क्या लाभ, अगर वह एक गरीब की सिसकियों को नहीं सुन सकती? डिजिटल इंडिया के इस दौर में, जहाँ ‘नो योर कस्टमर’ (KYC) की लंबी-चौड़ी बातें होती हैं, क्या बैंक के पास मृत्यु के सत्यापन का कोई मानवीय तरीका नहीं था?

 

यह घटना सिद्ध करती है कि हमारी व्यवस्था में ‘विवेक’ (Discretion) का लोप हो चुका है। अधिकारी अब केवल आदेशों के गुलाम बन चुके हैं, जहाँ दिल और दिमाग का उपयोग वर्जित है। जब प्रक्रिया (Process) न्याय से बड़ी हो जाए, तो वह शासन नहीं, बल्कि ‘अत्याचार’ बन जाती है।

 

## जवाबदेही का प्रश्न

 

क्या इस घटना के बाद कुछ सस्पेंशन और जाँच के दिखावे से बात बन जाएगी? बिल्कुल नहीं। सवाल उस मानसिकता का है जो गरीब को ‘अपात्र’ या ‘झूठा’ मानकर चलती है। सवाल उस शिक्षा का है जो मैनेजर तो बनाती है, लेकिन संवेदनशील इंसान बनाना भूल जाती है।

 

जीतू मुंडा ने अपनी बहन की हड्डियाँ दिखाकर केवल पैसे नहीं माँगे, बल्कि उन्होंने हमारे समाज के जमीर को आईना दिखाया है। वह आईना हमें बता रहा है कि हमारा सिस्टम ‘कंकाल’ हो चुका है। उसमें रक्त और मांस के रूप में संवेदनाएं अब शेष नहीं हैं।

 

क्योंझर की यह घटना एक चेतावनी है। यदि हम अपने नियमों में ‘इंसानियत’ का नमक नहीं घोल सकते, तो हमें खुद को एक सभ्य राष्ट्र कहने का कोई अधिकार नहीं है। न्याय केवल अदालत की मेजों पर नहीं होता, वह बैंक के काउंटर और सरकारी दफ्तर की खिड़कियों पर भी दिखना चाहिए। जीतू मुंडा की यह व्यथा इतिहास में हमारे समय की ‘सबसे बड़ी विफलता’ के रूप में याद की जाएगी। अब समय है कि हम कागज़ों की पूजा छोड़कर, उन धड़कते दिलों की सुनना शुरू करें जिनके लिए यह पूरा तंत्र बनाया गया है।

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