चुनाव आयोग, मीडिया और सत्ता: आरोपों के शोर में तथ्य, कानून और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता की कसौटी, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

चुनाव आयोग, मीडिया और सत्ता: आरोपों के शोर में तथ्य, कानून और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता की कसौटी

भारतीय लोकतंत्र की सबसे केंद्रीय संस्थाओं में से एक—भारतीय निर्वाचन आयोग—आज केवल चुनाव कराने वाली एजेंसी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक वैधता की संरक्षक के रूप में देखी जाती है। ऐसे में यदि उसके आचरण, भाषा या निर्णयों पर पक्षपात के आरोप लगते हैं, तो यह केवल एक संस्थागत विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक विश्वास (constitutional trust) का संकट बन जाता है।

पश्चिम बंगाल चुनावों के संदर्भ में आयोग की सोशल मीडिया पोस्ट, विपक्ष—विशेषकर तृणमूल कांग्रेस—के साथ टकराव, और कथित तौर पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने का विवाद, इस संकट को और गहरा करते हैं। लेकिन क्या इन घटनाओं से “मीडिया–चुनाव आयोग–सत्तारूढ़ दल” की सांठगांठ सिद्ध होती है? या यह निष्कर्ष अभी जल्दबाज़ी होगा? यही इस आलेख का केंद्रीय प्रश्न है।

1. भाषा का प्रश्न: क्या संवैधानिक संस्था ‘राजनीतिक’ हो रही है?

आयोग की पोस्ट—जिसमें सीधे एक दल का नाम लेकर “दो टूक” संदेश दिया गया—निश्चित ही असामान्य है। ऐतिहासिक रूप से, चुनाव आयोग ने अपने संचार में संस्थागत तटस्थता (institutional neutrality) बनाए रखी है।

यहाँ समस्या केवल शब्दों की नहीं, बल्कि संकेतों की है। जब एक संवैधानिक संस्था किसी एक दल को सार्वजनिक रूप से संबोधित करती है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि:

* क्या आयोग सभी दलों के साथ समान दूरी बनाए हुए है?
* या उसका संचार अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता जा रहा है?

यह स्थिति संवैधानिक मर्यादा (constitutional propriety) के विरुद्ध मानी जा सकती है, भले ही उसके पीछे प्रशासनिक मंशा सही क्यों न हो।

2. मतदाता सूची विवाद: आंकड़े, प्रक्रिया और संदेह

पश्चिम बंगाल में कथित रूप से लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मुद्दा अत्यंत गंभीर है। परंतु यहाँ दो स्तरों पर विश्लेषण आवश्यक है:

(क) विधिक प्रक्रिया

मतदाता सूची का संशोधन Representation of the People Act 1950 के तहत एक नियमित प्रक्रिया है। इसमें—

* मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं
* और नए मतदाताओं को जोड़ा जाता है

(ख) वास्तविक चिंता

यदि विपक्ष का यह आरोप है कि हटाए गए नाम चयनात्मक (selective) थे, तो यह एक गंभीर मामला बनता है। लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए आवश्यक है:

* बूथ-स्तरीय डेटा
* सामाजिक/भौगोलिक पैटर्न
* और स्वतंत्र ऑडिट

केवल बड़ी संख्या अपने-आप में षड्यंत्र का प्रमाण नहीं होती, लेकिन पारदर्शिता की कमी संदेह को जन्म देती है।

3. बैठक विवाद: संस्थागत संवाद का पतन

टीएमसी प्रतिनिधिमंडल और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच सात मिनट की बैठक, कथित “गेट आउट” टिप्पणी, और उसके बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया—यह सब दर्शाता है कि संवाद की संस्थागत संस्कृति कमजोर हो रही है।

लोकतंत्र में आयोग की भूमिका “न्यायाधीश” जैसी होती है—

* उसे सुनना चाहिए
* जवाब देना चाहिए
* और पारदर्शी रहना चाहिए

यदि विपक्ष को यह महसूस होता है कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक न्याय (procedural fairness) का प्रश्न बन जाता है।

4. मीडिया की भूमिका: प्रहरी या प्रतिध्वनि?

इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी जांच के दायरे में आती है।

* क्या मीडिया ने आयोग के व्यवहार पर समान रूप से कठोर प्रश्न उठाए?
* या उसने केवल राजनीतिक बयानबाज़ी को amplify किया?

लोकतंत्र में मीडिया “चौथा स्तंभ” है, लेकिन जब वह सत्ता या संस्थाओं के प्रति असंतुलित नरमी दिखाता है, तो उस पर “सांठगांठ” के आरोप लगना स्वाभाविक हो जाता है। हालाँकि, यह भी उतना ही सच है कि मीडिया एकरूप नहीं है—

* कुछ संस्थान आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करते हैं
* तो कुछ सत्ता-समर्थक रुख अपनाते हैं

इसलिए “पूरे मीडिया” को एक ही श्रेणी में रखना भी विश्लेषण की सटीकता को कम करता है।

5. संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: अनुच्छेद 324 की परीक्षा

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को व्यापक अधिकार देता है, लेकिन साथ ही एक नैतिक अपेक्षा भी जोड़ता है—पूर्ण निष्पक्षता (absolute neutrality)।

यदि आयोग के आचरण से यह धारणा बनती है कि वह किसी एक दल—जैसे भारतीय जनता पार्टी—के प्रति झुकाव रखता है, तो यह न केवल राजनीतिक, बल्कि संवैधानिक संकट है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा:

* धारणा (perception) और सिद्ध तथ्य (proven fact) अलग-अलग होते हैं

लोकतांत्रिक विमर्श में आरोप गंभीर हो सकते हैं, परंतु उन्हें स्थापित करने के लिए “स्वतंत्र जांच, न्यायिक परीक्षण और ठोस साक्ष्य” आवश्यक होते हैं।

6. प्रशासनिक आयाम: व्यक्तित्व बनाम संस्था

चुनाव आयुक्तों के व्यवहार—जैसे नाराज़गी, तीखी प्रतिक्रिया या अधिकारियों के साथ टकराव—से यह भी स्पष्ट होता है कि कभी-कभी “व्यक्तिगत आचरण संस्था की छवि पर भारी पड़ जाता है।”

* क्या यह केवल व्यक्तिगत शैली का प्रश्न है?
* या यह व्यापक संस्थागत संस्कृति का संकेत है?

यदि यह दूसरी स्थिति है, तो सुधार की आवश्यकता और भी गहरी है।

7. साख का संकट और सुधार की दिशा

आज स्थिति यह नहीं है कि लोकतंत्र समाप्त हो गया है, बल्कि यह है कि “विश्वास कमजोर हो रहा है।” और लोकतंत्र में विश्वास का क्षरण किसी भी बाहरी खतरे से अधिक खतरनाक होता है। आगे का रास्ता स्पष्ट है:

1. चुनाव आयोग को अपने संचार और निर्णयों में अधिक पारदर्शिता और संयम दिखाना होगा
2. विपक्ष को अपने आरोपों को डेटा और विधिक प्रक्रिया से पुष्ट करना होगा
3. मीडिया को सत्ता और संस्थाओं दोनों के प्रति समान रूप से जवाबदेह बनना होगा
4. और अंततः, यदि आवश्यक हो, तो न्यायपालिका—जैसे भारत का सर्वोच्च न्यायालय—को हस्तक्षेप कर संतुलन स्थापित करना होगा

“लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव नहीं, बल्कि उन चुनावों पर जनता का विश्वास है—और जब वही डगमगाने लगे, तो सबसे पहले संस्थाओं को ही आईना देखना पड़ता है।”

Leave a Comment