चंबल के पुल या ‘राष्ट्रीय धोखा’? तीन दशक के पत्रकारिता सफर से उठते तीखे सवाल
– शंकर देव तिवारी
चंबल का पानी जितना शांत दिखता है, उसके भीतर का जन-आक्रोश उतना ही खौलता हुआ है। उत्तर प्रदेश की बाह तहसील और मध्य प्रदेश की सीमा को जोड़ने वाले चंबल नदी के दो पुल—हसेत (उसैथ) और अटेर—आज विकास के स्मारक नहीं, बल्कि जनता के साथ किए गए एक ‘राष्ट्रीय धोखे’ की जीती-जागती मिसाल बन चुके हैं। यह कोई आम प्रशासनिक लेती-देती का मामला नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा मिलकर की गई एक संगठित धोखाधड़ी जैसी स्थिति है, जिसने चंबल के दोनों किनारों की लाखों की आबादी को ठगा है।
1989 का वह शिलान्यास और पत्रकारिता का दर्दएक पत्रकार के रूप में मेरी यादें आज भी 1989 के उस दौर में लौट जाती हैं, जब मैंने ‘अमर उजाला’ के लिए हसेत घाट पुल के शिलान्यास की कवरेज की थी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री के हाथों हुए उस शिलान्यास को देखकर बाह और चंबल अंचल की जनता की आंखों में उम्मीद की एक नई चमक थी। सोचा था कि सदियों का यह भौगोलिक पिछड़ापन अब दूर हो जाएगा। लेकिन किसे पता था कि दिल्ली और लखनऊ के नीति-नियंताओं के लिए यह सिर्फ एक चुनावी स्टंट था। सालों-साल फाइलें दबी रहीं। थक-हारकर जब मध्य प्रदेश सरकार ने अकेले अपने दम पर पुल का ढांचा खड़ा भी कर दिया, तो उत्तर प्रदेश की सीमा में घुसते ही विकास को ‘लकवा’ मार गया। वन विभाग की कागजी अनापत्तियां (NOC) और लिंक मार्ग का न बनना यह साबित करता है कि सरकारों के पास नीयत नाम की कोई चीज नहीं है।
अटेर का पुल: 30 फीट की सीढ़ी और व्यवस्था की संवेदनहीनताहसेत की कहानी अगर ‘उपेक्षा’ की है, तो अटेर पुल की कहानी ‘क्रूरता’ की पराकाष्ठा है। पुल बना, चालू होने की उम्मीद जगी, लेकिन फिर उसे बीच से काटकर बंद कर दिया गया। आज बाह और मध्य प्रदेश के बीच आवागमन करने वाले आम नागरिक, महिलाएं और बुजुर्ग अपनी जान हथेली पर रखकर 30 फीट ऊंची लोहे या बांस की सीढ़ियों के सहारे पुल पर चढ़ने और उतरने को मजबूर हैं। जरा सोचिए, जिस पुल को सफर आसान करने के लिए बनाया गया था, वह आज मौत का कुआं बना हुआ है। किसी बीमार को अस्पताल ले जाना हो, बच्चों को स्कूल जाना हो या किसानों को अपनी उपज मंडी तक पहुंचानी हो—यह 30 फीट की सीढ़ी लोकतंत्र के मुंह पर एक तमाचा है।
जनता की नजर में ‘बागियों’ की नई परिभाषाचंबल को दशकों तक ‘बागियों’ (दस्युओं) के इतिहास के लिए जाना जाता रहा। सरकारें और पुलिस हमेशा जंगलों और बीहड़ों में बागियों की सूचियां बनाती थीं। लेकिन आज वक्त बदल चुका है। आज इस अंचल की पीड़ित और ठगी गई जनता खुद अपने घरों में बैठकर सरकारों, मंत्रियों और बड़े-बड़े अफसरों की सूचियां बना रही है। जनता की नजर में असली बागी वो नहीं थे जो बीहड़ में बंदूक लेकर घूमते थे, बल्कि असली बागी तो ये सूट-बूट वाले नीति-नियंता हैं, जो जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये पानी में बहाकर, पुल खड़े करके भी उन्हें चालू नहीं होने देते। यह सीधे तौर पर जनता के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
अब आर-पार की लड़ाई जरूरी हैयह स्थिति अब केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक भयावह हकीकत है। केंद्र में बैठी सरकार और उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश की राज्य सरकारें डबल इंजन और ट्रिपल इंजन के विकास का दावा करती हैं, लेकिन बाह तहसील के मुहाने पर आकर यह इंजन पटरी से उतर जाता है। एक पत्रकार और इस माटी के नागरिक के रूप में मेरा यह सवाल है कि आखिर इस ‘राष्ट्रीय धोखे’ की जवाबदेही किसकी है? क्या चंबल की जनता को सिर्फ वोट बैंक समझा जाता रहेगा? जब तक हसेत और अटेर के इन पुलों को पूरी तरह से लिंक मार्गों से जोड़कर सुचारू रूप से चालू नहीं किया जाता, तब तक इस अंचल की जनता का यह आक्रोश शांत नहीं होगा। अब यह लड़ाई सिर्फ सीढ़ियां चढ़ने की नहीं, बल्कि अपने हक के लिए व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने की है।
प्राथमिकी दर्ज हो मेरी
सेवा में
महामहिम
राष्टृपति महोदया
भारत सरकार
नई दिल्ली ( भारत)
महोदय
चम्बल नदी पर से मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के साथ केंद्र सरकार ने मिलकर हूसेत घाट पर जो पुल का १९८९में शीलन्यास किया था वह बहुत बड़ा धोख़ा था। इस योजना का कहीं किसी भी पुल योजना मे शामिल किये बिना केंद्र सरकार से दश्यु उन्मूलन का मिला पांच करोड़ रुपया खर्च कर तत्कालीन प्रधान मंत्री के हाथों आधार शिला रखवा भ्रम में जनता को डाला गया। इसमें दोनों राज्यों के तब के मुख्य मंत्री भी शामिल थे। बीस साल बीतने के बाद मध्य प्रदेश ने जिन दो पुलों को इसके साथ शुरू कराया निर्माण अपनी ओर पूरा करा अधूरा छोड़ा हुआ है। जिससे अटेर घाट पर तो दो माह तक चलने के बाद पुनः उसकी हाइट बढ़ाने के लिए और अब उत्तर प्रदेश के हिस्से का लिंक अप अपडेट न होने से मौत का कुआ बनाके रोका हुआ है। इस बने पुल का पैदल यात्री जान जोखिम में डालकर प्रयोग कर रहे हैं। इस पुल पर तीस फुट की सीडी लगाकर चढ़ा उतरा जा रहा है।
महोदय तीन दशकों से ज्यादा समय से दिखाया जाने वाला एक भी पुल जनता को नहीं मिला है ये मामला राष्ट्रीय धोख़ा की श्रेणी में मान उचित कार्रवाई होनी चाहिए।
एक नहीं अनेक
फिल्हाल शंकर देव तिवारी









