जबरा मारे और रोने भी न दे: UPPCL प्रबंधन ने श्रद्धांजलि सभा को भी ‘आंदोलन’ मान लिया, आखिर यह तानाशाही कब तक?”*

*“जबरा मारे और रोने भी न दे: UPPCL प्रबंधन ने श्रद्धांजलि सभा को भी ‘आंदोलन’ मान लिया, आखिर यह तानाशाही कब तक?”*

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*मृत साथियों को श्रद्धांजलि देने की तैयारी पर सख्त सर्कुलर, कर्मचारियों ने पूछा— क्या शोक मनाना भी अब अपराध है?*

 

लखनऊ।उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) में इन दिनों एक ऐसा घटनाक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने केवल कर्मचारियों को ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता, श्रमिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मृत साथियों की स्मृति में आयोजित की जाने वाली एक श्रद्धांजलि सभा को लेकर प्रबंधन ने ऐसे निर्देश जारी कर दिए, मानो प्रदेशभर में कोई बड़ा आंदोलन, कार्य बहिष्कार या टकराव होने वाला हो?

पूरे विवाद की शुरुआत उत्तर प्रदेश के ठेका एवं संविदा कर्मचारियों की यूनियन द्वारा जारी पत्र संख्या-30/26 दिनांक 29 मई 2026 से हुई। इस पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि 1 जून को प्रदेशभर में दिवंगत साथियों की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाएगी। पत्र में कहीं भी धरना, प्रदर्शन, हड़ताल, सत्याग्रह अथवा कार्य बहिष्कार जैसी किसी गतिविधि का उल्लेख नहीं था। इसके बावजूद अगले ही दिन, 30 मई को UPPCL के निदेशक (कार्मिक एवं प्रशासन) डॉ. जीन मधाई द्वारा पत्र संख्या-1449-औ0सं0/2026-02 जारी कर सभी प्रबंध निदेशकों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दे दिए गए।

निर्देशों में कहा गया कि किसी भी परिस्थिति में विद्युत आपूर्ति प्रभावित नहीं होनी चाहिए, सभी विद्युत प्रतिष्ठानों और कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, आवश्यकता पड़ने पर पुलिस-प्रशासन का सहयोग लिया जाए तथा आउटसोर्स कर्मचारियों को सभा में भाग लेने अथवा अवकाश लेने की अनुमति न दी जाए। यही वह बिंदु है, जहां से कर्मचारियों के बीच असंतोष और प्रश्नों का दौर शुरू हो गया। जब इस संबंध में समय के उपभोक्ता के संपादक नेता डॉक्टर जॉन मैथ्यू निदेशक कार्य प्रशासन पावर कॉरपोरेशन उत्तर प्रदेश और प्रबंध निदेशक नीतीश कुमार को उनके मोबाइल नंबरों पर इस आदेश का जवाब जानने के लिए फोन किया गया तो दोनों ही अधिकारियों का फोन नहीं उठा इससे यह प्रतीत होता है कि अधिकारी पत्रकारों के सवालों से बचते नजर आ रहे हैं ।

 

इस आदेश पर कर्मचारी संगठनों का कहना है कि जब उन्होंने किसी आंदोलन की घोषणा ही नहीं की, तब इतनी कठोर प्रशासनिक तैयारी की आवश्यकता आखिर क्यों महसूस हुई? क्या श्रद्धांजलि सभा को भी अब संभावित विरोध प्रदर्शन की श्रेणी में रखा जाने लगा है? यदि कोई कर्मचारी अपने दिवंगत साथियों को याद करना चाहता है, तो क्या उसे भी प्रशासनिक संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा?

प्रबंधन ने अपने पत्र में वर्ष 2025 की शासन अधिसूचना संख्या-3/205/24-पी-2-2025 का हवाला देते हुए कहा है कि ऊर्जा क्षेत्र में छह माह तक हड़ताल निषिद्ध है और किसी भी प्रकार का सत्याग्रह, विरोध प्रदर्शन अथवा कार्य बहिष्कार गैर-कानूनी होगा। लेकिन कर्मचारियों का तर्क है कि जब कार्यक्रम श्रद्धांजलि सभा का था, तब हड़ताल निषेध अधिसूचना का उल्लेख क्यों किया गया? क्या श्रद्धांजलि सभा और आंदोलन में अंतर करना भी अब आवश्यक नहीं समझा जा रहा?

 

यूनियन का कहना है कि वे केवल उन साथियों को श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहते हैं जिन्होंने विद्युत व्यवस्था को सुचारु रखने के दौरान अपने प्राण गंवा दिए। उनका प्रश्न है कि क्या अपने मृत साथियों को याद करना, उनके सम्मान में मौन रखना और उनके परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करना भी अब अपराध की श्रेणी में आ गया है? क्या संविदाकर्मियों के लिए शोक व्यक्त करने का अधिकार भी सीमित किया जा सकता है?

यह विवाद केवल श्रद्धांजलि सभा तक सीमित नहीं है। कर्मचारी संगठन लंबे समय से स्टाफ की कमी, कार्यस्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था और लगातार बढ़ती दुर्घटनाओं को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि 15 मई 2017 के आदेश की भावना के विपरीत आउटसोर्स कर्मचारियों की संख्या में कटौती की गई, जिसके परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर 11 केवी फीडरों पर पूरा गैंग तैनात करने के बजाय एक ही कर्मचारी के भरोसे कार्य कराया जा रहा है। यूनियन का दावा है कि कई स्थानों पर अकुशल श्रमिकों से भी एचटी और एलटी लाइनों तथा ट्रांसफार्मरों पर कार्य कराया जा रहा है, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका लगातार बढ़ी है।

कर्मचारियों का कहना है कि जब दुर्घटनाएं होती हैं, तब परिवार उजड़ते हैं, बच्चे अनाथ होते हैं और घरों के चिराग बुझ जाते हैं। ऐसे में यदि कर्मचारी अपने दिवंगत साथियों को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्र होना चाहते हैं, तो उसे भी प्रशासनिक सख्ती के दायरे में क्यों लाया जा रहा है? क्या संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की जगह अब केवल आदेश और प्रतिबंध ही रह गए हैं?

 

इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “इसे ही तो कहते हैं— जबरा मारे और रोने भी न दे।” उनके अनुसार यदि श्रद्धांजलि सभा जैसी मानवीय गतिविधि को भी संभावित आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है, तो यह प्रशासनिक सोच पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उनका कहना है कि श्रद्धांजलि सभा और विरोध प्रदर्शन के बीच का अंतर समझना किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था की बुनियादी संवेदनशीलता का हिस्सा होना चाहिए।

 

इस विवाद ने एक और गंभीर प्रश्न को जन्म दिया है। क्या उत्तर प्रदेश शासन के उच्च अधिकारियों को ऐसा अधिकार प्राप्त हो चुका है कि संविदा कर्मियों के मौलिक और मानवीय अधिकार भी उनकी प्रशासनिक व्याख्या के अधीन हो जाएं? क्या मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शोक प्रकट करने का अधिकार भी अब सरकारी अनुमति के मोहताज बनते जा रहे हैं? कई कर्मचारी यह प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या प्रशासनिक कठोरता का यह स्वरूप कहीं उस औपनिवेशिक मानसिकता की याद तो नहीं दिलाता, जिसमें आदेश सर्वोपरि और मानवीय भावनाएं गौण मानी जाती थीं?

कुछ कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी है कि क्या प्रबंधन को इस बात की आशंका है कि श्रद्धांजलि सभा के दौरान कार्यस्थलों पर हुई दुर्घटनाओं और दिवंगत संविदाकर्मियों की वास्तविक संख्या पर फिर से चर्चा शुरू हो सकती है? हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन कर्मचारियों के बीच उठ रहे ये सवाल इस पूरे विवाद को और अधिक गंभीर बना रहे हैं।

 

फिलहाल प्रदेशभर की निगाहें 1 जून पर टिकी हुई हैं। क्या यह दिन दिवंगत कर्मचारियों को शांतिपूर्ण श्रद्धांजलि देने का अवसर बनेगा, या फिर प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच बढ़ती दूरी का नया प्रतीक बन जाएगा? यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि इस पूरे घटनाक्रम ने संविदाकर्मियों की स्थिति, उनके अधिकारों, कार्यस्थल की सुरक्षा और प्रशासनिक संवेदनशीलता को लेकर एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है। जब इस संबंध में प्रबंध निदेशक पावर कॉरपोरेशन श्री नीतीश कुमार और निदेशक कार्य प्रशासन जॉन मैथ्यू जी से दूरभाष शब्द पर संपर्क करने की कोशिश की गई तो दोनों ने फोन नहीं उठाया ।

 

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है— क्या अपने मृत साथियों को श्रद्धांजलि देना भी प्रशासनिक अनुमति का विषय बन चुका है, या फिर यह विवाद केवल संवेदनशीलता और संवाद की कमी का परिणाम है? उत्तर चाहे जो हो, लेकिन यह मामला कर्मचारियों के मन में उठ रहे अनेक प्रश्नों को और अधिक गहरा कर गया है। क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने और और उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन के निदेशक का प्रशासन ने क्रमिकों का मानव अधिकार का हक भी छीन लिया है इससे तो लगता है कि इनके अंदर कोई मानव संवेदना है ही नहीं खुद तो श्रद्धांजलि देने से रहे दूसरों को भी श्रद्धांजलि देने अशोक प्रकट करने से रोक रहे हैं इसको तानाशाही नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ? खैर

 

युद्ध अभी शेष है

 

*अविजित आनन्द संपादक और चन्द्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ*

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