26 नवम्बर – संविधान दिवस पर विशेष: संविधान पर सबसे बड़ा हमला

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

रिपोर्ट: निशा कांत शर्मा

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संविधान पर सबसे बड़ा हमला 1975 में हुआ था। 25 जून, 1975 को देश में इमरजेंसी लगी और इस दौरान कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं, लेकिन उनमें से सबसे महत्वपूर्ण रहा संविधान में निजी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित बदलाव। आपातकाल के दौरान संविधान में इस हद तक बदलाव किए गए कि इसे अंग्रेजी में ‘कांस्टीट्यूशन आफ इंडिया’ की जगह ‘कांस्टीट्यूशन आफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था। ‘इंडिया इज इंदिरा’ कहने वालों ने 42वें संविधान संशोधन से भारत के संविधान को ‘इंदिरा का संविधान’ बना दिया था।
आपातकाल लागू होने के एक महीने के भीतर 22 जुलाई, 1975 को संविधान में 38वां संशोधन पारित किया गया था, जिसमें न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया। दो महीने बाद ही इंदिरा गांधी के लिए प्रधानमंत्री पद बरकरार रखने के इरादे से संविधान में 39वां संशोधन पेश किया गया। चूंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था, इसलिए 39वें संशोधन ने देश के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार उच्च न्यायालयों से छीन लिया। संशोधन के अनुसार, प्रधानमंत्री के चुनाव की जांच एवं परीक्षण केवल संसद
द्वारा गठित समिति द्वारा ही की जा सकेगी।
1976 में जब लगभग सभी विपक्षी सांसद या तो भूमिगत थे या जेलों में थे, तब 42वें संशोधन ने भारत का विवरण ‘संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य’ से बदलकर ‘संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य’ कर दिया। 42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रविधानों में से एक था मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना। इसके कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा सकता था। इस संशोधन ने न्यायपालिका को पूरी तरह से कमजोर कर दिया था, वहीं विधायिका को अपार शक्तियां दे दी गई थीं।
संवैधानिक संशोधन के बाद से भारत के राष्ट्रपति के लिए मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करना अनिवार्य हो गया। मौलिक अधिकारों के महत्व का बहुत अधिक अवमूल्यन किया गया। इस संशोधन ने अनुच्छेद 368 सहित 40 अनुच्छेदों में परिवर्तन किया और घोषित किया कि संसद की संविधान निर्माण शक्ति पर कोई सीमा नहीं होगी और किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन सहित किसी भी आधार पर किसी भी अदालत में संसद द्वारा किए गए किसी भी संशोधन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है।

Leave a Comment

और पढ़ें