सर्वोच्च न्यायालय के 20.12.2024 के आदेश के अनुपालन में उत्तर प्रदेश की सभी बार एसोसिएशनों के नव-निर्वाचित पदाधिकारियों से लिखित अंडरटेकिंग ली जा रही है कि…
बार एसोसिएशन या उसके सदस्य हड़ताल/कार्य बहिष्कार नहीं करेंगे।,
न्यायिक कार्य में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे।,
यदि ऐसा किया गया तो यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन माना जाएगा।
आदेश के पैरा-2 में कहा गया है कि यदि अंडरटेकिंग देने के बाद भी कोई बार एसोसिएशन हड़ताल या बहिष्कार करती है, तो नव-निर्वाचित पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माने जा सकते हैं।
यही इस आदेश का सबसे बड़ा प्रभाव है।
इस आदेश के बाद
बार एसोसिएशन द्वारा न्यायिक कार्य के बहिष्कार का निर्णय लेना अत्यंत कठिन हो जाएगा।,
अध्यक्ष, महामंत्री एवं अन्य पदाधिकारी किसी भी आंदोलन के निर्णय से पहले कई बार सोचेंगे क्योंकि व्यक्तिगत जिम्मेदारी का खतरा रहेगा, तथा
जिला न्यायाधीशों को अनुपालन रिपोर्ट उच्च न्यायालय को भेजनी होगी।
इस आदेश में यह नहीं लिखा है कि बार संघ ज्ञापन नहीं दे सकता, धरना नहीं दे सकता,
प्रेस वार्ता नहीं कर सकता।
न्यायिक या प्रशासनिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज नहीं उठा सकता,
जनहित के मुद्दों पर आंदोलन नहीं कर सकता,
प्रतिबंध मुख्य रूप से हड़ताल और न्यायिक कार्य बहिष्कार पर है।
वास्तविक चिंता यह है कि भविष्य में यदि किसी भी प्रकार के सामूहिक विरोध को *न्यायिक कार्य में बाधा* मान लिया जाए, तो बार संघों की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
इसीलिए आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होगा कि…
*क्या इस आदेश की व्याख्या केवल हड़ताल/कार्य बहिष्कार तक सीमित रहेगी, या बार संघों की अन्य लोकतांत्रिक गतिविधियों तक भी विस्तार किया जाएगा?*
यह आदेश सीधे-सीधे अधिवक्ताओं की आवाज़ बंद नहीं करता, लेकिन *हड़ताल और न्यायिक कार्य बहिष्कार को लगभग असंभव बना देता है* तथा बार पदाधिकारियों पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी का दबाव डालता है।
इसी कारण कुछ अधिवक्ता इसे *न्याय तक पहुंच के अधिकार की रक्षा* मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे *बार संघों की संस्थागत स्वायत्तता पर नियंत्रण* के रूप में देख रहे हैं। कानूनी बहस अब इस बात पर केंद्रित होगी कि इसकी व्याख्या भविष्य में कितनी व्यापक या सीमित की जाती है।
🙏









