एक ट्रैक्टर-लोडर पकड़ा, बाकी फरार — FIR नहीं, जब्ती मेमो नहीं; नियमों की खुली अनदेखी या सुनियोजित ढील?

*एटा में ‘खनन माफिया बनाम कानून’ — तहसीलदार की छापेमारी के बाद भी कार्रवाई अधूरी, जब्ती बिना कागज़ात; प्रशासन पर मिलीभगत के गंभीर सवाल*

 

 

*एक ट्रैक्टर-लोडर पकड़ा, बाकी फरार — FIR नहीं, जब्ती मेमो नहीं; नियमों की खुली अनदेखी या सुनियोजित ढील?*

 

*तुर्रम सिंह राजपूत✍️*

 

एटा (उत्तर प्रदेश), जनपद एटा के तहसील क्षेत्र जलेसर अंतर्गत ग्राम वलीदादपुर के समीप अवैध मिट्टी खनन का मामला प्रशासनिक सख्ती के दावों को चुनौती देता नजर आ रहा है। मध्य रात्रि में तहसीलदार संदीप सिंह द्वारा की गई छापेमारी में एक ट्रैक्टर-लोडर को मौके से पकड़ लिया गया, जबकि आधा दर्जन से अधिक ट्रैक्टर-ट्रॉली व अन्य मशीनें अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गईं।

सबसे गंभीर पहलू यह है कि जब्त किए गए ट्रैक्टर-लोडर को कोतवाली जलेसर में खड़ा कराए जाने के बावजूद अब तक न तो कोई आधिकारिक FIR दर्ज की गई है, न ही जब्ती की विधिवत कार्यवाही (Seizure Memo) पूरी की गई है और न ही सुपुर्दगी का कोई लिखित रिकॉर्ड जारी हुआ है। यह स्थिति न केवल प्रक्रियागत लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि पूरे घटनाक्रम को संदेह के घेरे में खड़ा करती है।

*सरकारी नियमों की सीधी अनदेखी*

उत्तर प्रदेश सरकार की स्पष्ट नीति के अनुसार, अवैध खनन, परिवहन और भंडारण पर शून्य सहिष्णुता लागू है।

उत्तर प्रदेश मिनरल्स (प्रिवेंशन ऑफ इललीगल माइनिंग, ट्रांसपोर्टेशन एंड स्टोरेज) रूल्स, 2018 तथा MMDR Act के तहत:

मौके पर पकड़े गए वाहन/मशीनरी की तत्काल जब्ती अनिवार्य है

जब्ती मेमो, फोटो साक्ष्य और रिपोर्ट तत्काल तैयार की जानी चाहिए

संबंधित थाने में FIR दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू करना जरूरी है

पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का आकलन कर वसूली की प्रक्रिया प्रारंभ की जानी चाहिए

मगर जलेसर के इस मामले में इन सभी अनिवार्य प्रावधानों की अनदेखी स्पष्ट रूप से सामने आ रही है।

*कार्रवाई पर उठते कठोर सवाल*

एक ही वाहन क्यों पकड़ा गया, जबकि कई अन्य मौके से भाग निकले?

जब्ती के कई घंटे/समय बीतने के बाद भी आधिकारिक दस्तावेज क्यों नहीं बने?

FIR दर्ज करने में देरी किसके दबाव या संकेत पर हो रही है?

क्या यह देरी अवैध खनन माफियाओं को राहत देने की रणनीति है?

*प्रशासनिक छवि पर गहरा आघात*

तहसीलदार की छापेमारी को प्रारंभिक स्तर पर सख्त कार्रवाई माना जा सकता है, लेकिन उसके बाद की ढिलाई पूरे ऑपरेशन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है। बिना विधिक प्रक्रिया के जब्ती, न्यायालय में टिक नहीं पाती और अंततः आरोपी लाभ की स्थिति में आ जाते हैं।

जिलाधिकारी से तत्काल हस्तक्षेप की मांग

स्थानीय नागरिकों और जागरूक वर्ग ने *जिलाधिकारी एटा से मांग की है कि:*

पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए

संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो

FIR दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए

फरार वाहनों की पहचान कर सख्त कार्रवाई हो

पर्यावरण और राजस्व पर सीधा हमला

अवैध मिट्टी खनन केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि:

सरकारी राजस्व की भारी हानि

कृषि भूमि की क्षति

भू-जल स्तर पर असर

पर्यावरणीय संतुलन का विनाश

जैसे गंभीर परिणामों को जन्म देता है।

एटा का यह मामला साफ संकेत देता है कि सिर्फ छापेमारी से नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया की पूर्ण पारदर्शिता और तत्परता से ही अवैध खनन पर लगाम लग सकती है।

यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो यह ढिलाई खनन माफियाओं को खुली छूट देने के समान होगी।

सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ दावे की साख दांव पर है — अब निर्णायक कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प है।

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