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यमुना की कराह:  ब्रज में आस्था पर गंदगी का साया एन जी टी का सख्त कदम, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

यमुना की कराह:

ब्रज में आस्था पर गंदगी का साया

एन जी टी का सख्त कदम

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आगरा।हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आखिरकार नींद तोड़ी। उसने जल शक्ति मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा-वृंदावन नगर निगम, विकास प्राधिकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को नोटिस थमाया। वजह साफ है: यमुना की बिगड़ती हालत। यह कदम देर से आया, मगर जरूरी था।

यह मामला विजय किशोर गोस्वामी की याचिका से उठा। वे ब्रज वृंदावन देवालय समिति के संयुक्त सचिव हैं और श्री राधा मदन मोहन मंदिर के मुख्य सेवायत भी। उन्होंने साफ कहा; 17 दिसंबर 2021 के आदेशों की खुलेआम अवहेलना हुई है। तब ट्रिब्यूनल ने सीवेज ट्रीटमेंट सुधारने, अतिक्रमण हटाने और किनारों पर हरियाली बढ़ाने का हुक्म दिया था। लेकिन हकीकत वही ढाक के तीन पात। गंदा पानी आज भी बेखौफ बह रहा है। यमुना का दम घुट रहा है।

यह सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं है। यह तहज़ीब का सवाल है। करोड़ों लोगों के लिए यमुना सिर्फ नदी नहीं, “माँ यमुना” है। यही ब्रज की रगों में बहती है। यहीं श्रीकृष्ण की लीलाएं हुईं। भक्त आज भी आचमन करते हैं, आरती उतारते हैं। मगर आज का पानी नहाने लायक भी नहीं रहा। पवित्रता तो दूर की बात है।

विशेषज्ञों ने भी खतरे की घंटी बजाई है। यमुना का पानी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ‘क्लास D’ श्रेणी में है। यानी यह पानी केवल जलीय जीवों के लिए ठीक है, इंसानों के लिए नहीं। इसमें घुलित ऑक्सीजन कम है। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड ज्यादा है। और सबसे खतरनाक—फीकल कॉलिफॉर्म की मात्रा हजारों गुना ऊपर।

दिल्ली का हाल तो और भी बदतर है। यमुना की कुल लंबाई 1376 किलोमीटर है, लेकिन सिर्फ 22 किलोमीटर का दिल्ली हिस्सा 80 फीसदी प्रदूषण ढोता है। यहां फीकल कॉलिफॉर्म 92,000 MPN/100ml तक पहुंच चुका है, जबकि नहाने के लिए सीमा 2,500 है। कई जगहों पर ऑक्सीजन लगभग शून्य है। पानी जिंदा नहीं, सड़ा हुआ लगता है।

दिल्ली रोजाना करोड़ों लीटर गंदा पानी यमुना में उड़ेलती है। 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट होने के बावजूद हालात जस के तस हैं। कहीं पाइपलाइन अधूरी है, कहीं मशीनें बंद हैं। नतीजा: अधपका या कच्चा सीवेज सीधे नदी में गिरता है। यही जहर मथुरा-वृंदावन तक पहुंचता है।

ब्रज में भी हालत कुछ कम नहीं। दर्जनों नाले यमुना में गिरते हैं। कई बिना ट्रीटमेंट के। ऊपर से अतिक्रमण की मार। 2025 के ड्रोन सर्वे में वृंदावन के बाढ़ क्षेत्र में 1,266 अवैध निर्माण मिले। ये न सिर्फ नदी के बहाव को रोकते हैं, बल्कि प्रदूषण को भी बढ़ाते हैं। रेत खनन, गाद जमाव और बंद हो चुकी सहायक नदियां: सब मिलकर यमुना को बीमार बना रहे हैं।

बरसात के अलावा महीनों में यमुना का प्रवाह बेहद कम हो जाता है। पानी ठहर जाता है। सड़ांध बढ़ती है। नदी नाला बन जाती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि न्यूनतम जल प्रवाह तय होना चाहिए, ताकि नदी जिंदा रहे। मगर इस पर अमल ढीला है।

अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ पूछते हैं, “सवाल उठता है; इतनी योजनाओं का क्या हुआ? 1990 के दशक से यमुना एक्शन प्लान चल रहा है। फिर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन आया। अरबों रुपये खर्च हुए। घाट बने, पाइप बिछे, प्लांट लगे। लेकिन जमीन पर नतीजा नदारद। यह सब कागजी घोड़े लगते हैं।”

आगरा में इसका असर साफ दिखता है। यमुना का गंदा पानी ताजमहल तक पहुंचता है। झाग, बदरंग पानी और मछलियों की मौत आम बात है। शाम की आरती में दीये तो जलते हैं, मगर पानी मुस्कुराता नहीं। उसकी चमक कहीं खो गई है।

रिवर कनेक्ट से जुड़े एक्टिविस्ट्स कहते हैं, असल बीमारी सिस्टम में है। विभाग अलग-अलग दिशा में भाग रहे हैं। तालमेल गायब है। कानून का डर नहीं। विकास के नाम पर कंक्रीट जंगल उग रहे हैं। नदी का सीना सिकुड़ रहा है।

ब्रज वृंदावन देवालय समिति ने भी साफ कहा; “निर्मल यमुना जल” मंदिर परंपराओं के लिए जरूरी है। मगर हुकूमत के कानों पर जूं नहीं रेंगती। आदेश आते हैं, फाइलों में दब जाते हैं। अतिक्रमण हटाने की बातें होती हैं, मगर बुलडोजर नहीं चलता।

अब रास्ता क्या है? जवाब आसान नहीं, मगर जरूरी है।

पहला कदम; मथुरा-वृंदावन के सभी नालों को तुरंत ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए। प्लांट की क्षमता बढ़े और निगरानी सख्त हो।

दूसरा: बाढ़ क्षेत्र से अवैध निर्माण हटाने की समयबद्ध मुहिम चले। 1,266 निर्माण सिर्फ आंकड़ा नहीं, खतरे की घंटी हैं।

तीसरा: साल भर न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित हो। ऊपर के बैराज से पानी छोड़ा जाए। सहायक नदियों को जिंदा किया जाए।

चौथा: नदी को “जीवित इकाई” मानकर सख्त कानून बने। उल्लंघन पर भारी जुर्माना हो।

साथ ही, समाज को भी आगे आना होगा। आगरा में हालात पर रिवर कनेक्ट अभियान के कार्यकर्ताओं का दर्द छलकता है। डॉ देवाशीष भट्टाचार्य ने तल्ख़ लहजे में कहा, “आगरा में यमुना अब नदी नहीं, ज़हरीली नाली बन चुकी है। यह गंदा पानी इंसानों की सेहत के लिए ख़तरा है और ताजमहल जैसे ऐतिहासिक स्मारकों पर भी असर डाल रहा है।”

यमुना भक्त डॉ ज्योति खंडेलवाल और विशाल झा कहते हैं, “हमने बरसों से यमुना बैराज की मांग उठाई है, ताकि पानी का स्तर सुधरे और प्रवाह बना रहे, मगर सरकार की रफ़्तार कछुए से भी धीमी है। हर साल वादे होते हैं, हर साल फाइलें घूमती हैं, मगर ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता। अगर अब भी हुकूमत ने होश नहीं लिया, तो आने वाली नस्लें हमें माफ़ नहीं करेंगी।”

रिवर एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “NGT का नोटिस एक चेतावनी है। आखिरी नहीं, मगर अहम। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह भी कागज बनकर रह जाएगा।”

यमुना ब्रज की धड़कन है। अगर यह धड़कन थम गई, तो ब्रज की रूह सूख जाएगी। बात साफ है; यमुना को बचाइए, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।

अब वक्त है। फैसले का। इरादे का। और असली कार्रवाई का।

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