‘अभाव’ और ‘लेटलतीफी’ की शिकार भारतीय डाक:
किसका फायदा, किसका नुकसान?
शंकर देव तिवारी
सरकारी और सहकारी संस्थाओं का पतन हमारे दौर की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है। दूरसंचार क्षेत्र में भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) को जिस तरह निजी कंपनियों की प्रतिस्पर्धा और आंतरिक ढुलमुल नीति के दलदल में धकेला गया, वह इतिहास हमारे सामने है। दुर्भाग्य से, आज वही कहानी भारतीय डाक विभाग (India Post) के साथ दोहराई जा रही है। जो डाकघर कभी विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रतीक हुआ करता था, आज वह खुद अपनी पहचान और जनता के भरोसे को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।जमीनी हकीकत यह है कि आज उप-निबंधन (रजिस्ट्री) कार्यालयों या डाकघरों में बुनियादी चीजें जैसे सरकारी लिफाफे, टिकट और रसीदी टिकट ढूंढने से नहीं मिलते। आम जनता को मजबूरन इन्हें बाहर से महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है। यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि कृत्रिम रूप से पैदा किया हुआ प्रतीत होता है। पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र और रसीदी टिकट जैसी चीजें जो आम आदमी की जेब के अनुकूल थीं, उन्हें धीरे-धीरे ‘अभाव की गलियों’ में गायब किया जा रहा है ताकि लोग महंगे विकल्पों की ओर बढ़ें।इससे भी बड़ा घालमेल ‘स्पीड पोस्ट’ जैसी प्रीमियम सेवाओं में देखने को मिल रहा है। जो पत्र लखनऊ जैसे प्रांतीय मुख्यालय पर तीसरे दिन पहुंच जाना चाहिए था, उसे पहुंचने में दस दिन लग रहे हैं। मध्य प्रदेश के शहडोल से कानपुर जैसे औद्योगिक शहर तक एक अखबार का लिफाफा पहुंचने में 12 दिन का समय लग जाता है। पूछने पर विभाग के पास सौ बहाने होते हैं। आशंकाएं निराधार नहीं हैं कि निजी कोरियर कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी स्पीड पोस्ट की रफ्तार को जानबूझकर ‘धीमा’ किया जा रहा है। जब सरकारी सेवाएं लचर होंगी, तो उपभोक्ता मजबूरन निजी ऑपरेटरों की शरण में जाएगा।डाकघर सिर्फ चिट्ठियां पहुंचाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ‘बैंक जैसा स्वप्न’ दिखाने वाले डाकघरों की हालत आज गांवों से लेकर शहरों तक खस्ताहाल है। सबसे गंभीर असर डाकघर की लघु बचत योजनाओं (Small Savings Schemes) पर पड़ रहा है। देश की करोड़ों महिलाओं और बुजुर्गों का खून-पसीने का पैसा डाकघर की आरडी, एफडी और सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं में सुरक्षित रहता है। लेकिन जब पूरी व्यवस्था ही उदासीनता और भ्रष्टाचार की चपेट में दिखने लगे, तो महिलाओं का यह भरोसा टूटने लगता है।यदि समय रहते इस ‘दीमक’ को नहीं रोका गया, तो डाक विभाग का हश्र भी सहकारिता और बीएसएनएल जैसा ही होगा। सरकार को तत्काल कोरियर कंपनियों और निचले स्तर के कर्मचारियों की कथित सांठगांठ की जांच करानी चाहिए। डाकघरों में डिजिटल तकनीक के साथ-साथ बुनियादी स्टेशनरी (लिफाफे, टिकट) की उपलब्धता अनिवार्य की जानी चाहिए। जनता का विश्वास ही किसी भी सरकारी संस्था की असली पूंजी है। इसे निजी मुनाफे की वेदी पर चढ़ने से बचाना ही होगा।
















