*लोकतंत्र की धड़कन: नीति-निर्माण में मीडिया की प्रत्यक्ष भागीदारी क्यों अनिवार्य है?*
*23 अगस्त 2026 को लखनऊ चलो!*
*अपने संवैधानिक अधिकारों की आवाज उठाएं ,मीडिया अधिकार महारैली को सफल बनाएं,*
– एके बिंदुसार, संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन (National Core Committee),
*सम्मानित साथियों,*
लोकतंत्र के तीन आधारभूत स्तंभ—विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive), और न्यायपालिका (Judiciary)—देश के संचालन और दिशा-निर्धारण का कार्य करते हैं। वहीं, ‘चौथा स्तंभ’ (Fourth Estate) के रूप में प्रतिष्ठित मीडिया (Media) पर इस संपूर्ण व्यवस्था की निगरानी का गुरुतर दायित्व है। किंतु, यह एक बड़ी विडंबना है कि जो समाज की जमीनी समस्याओं को सबसे गहराई से समझते हैं और जिनकी लेखनी आम जनता की आवाज बनती है, उनके पास नीति-निर्माण (Policy Making) की मुख्य मेज पर बैठने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
अब समय आ गया है कि हम केवल ‘निगरानी’ (Surveillance) से आगे बढ़कर ‘भागीदारी’ (Participation) की ओर कदम बढ़ाएं।
समय की मांग: ‘मीडिया कोटा’ और संवैधानिक प्रतिनिधित्व
भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण इसी में है कि वह समय के साथ अपने संवैधानिक ढांचे (Constitutional Framework) को अधिक समावेशी और सशक्त बनाए। इस दिशा में हमारे मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं:
संवैधानिक संशोधन (Constitutional Amendment): भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 (राज्यसभा) और अनुच्छेद 171 (विधान परिषद) में ‘साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा’ की श्रेणियों के साथ ‘पत्रकारिता’ (Journalism) को एक विशिष्ट श्रेणी के रूप में शामिल करना अनिवार्य है। पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत का वह दर्पण है, जिसके बिना नीति-निर्माण का कार्य अधूरा है।
मीडिया निर्वाचन क्षेत्र (Journalist Constituencies): जिस प्रकार विधान परिषदों में स्नातक (Graduate) और शिक्षक (Teacher) निर्वाचन क्षेत्र मौजूद हैं, उसी तर्ज पर ‘पत्रकार निर्वाचन क्षेत्र’ का सृजन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का एक तार्किक विस्तार होगा। यह एक ऐसा मंच होगा जहाँ केवल मान्यता प्राप्त पत्रकार ही नहीं बल्कि अधिमान्यता एवं स्वतंत्र पत्रकार मीडिया संगठनों के सदस्य अपने प्रतिनिधि को चुनकर नीति-निर्माण की प्रक्रिया में भेज सकेंगे।
यह मांग क्यों तार्किक है?
संसद और विधानसभाओं में पत्रकारों की उपस्थिति किसी विशेषाधिकार की मांग नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता सुधारने की एक ठोस आवश्यकता है:
व्यावहारिक अनुभव (Grassroot Insights): पत्रकार उन प्रशासनिक कमियों और जनता के कष्टों को प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं जो अक्सर सरकारी फाइलों में दब जाती हैं। उनकी सदन में उपस्थिति कानून निर्माण को अकादमिक (Academic) होने के बजाय जनोन्मुखी और व्यावहारिक बनाएगी।
लोकतांत्रिक संतुलन (Democratic Balance): आज के दौर में जब मीडिया की भूमिका और उसकी स्वतंत्रता पर अक्सर प्रश्न उठाए जाते हैं, तब उसे नीति-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनाना शक्ति का एक सकारात्मक संतुलन स्थापित करेगा।
उत्तरदायित्व और पारदर्शिता (Accountability & Transparency): दशकों तक जन-सरोकारों पर रिपोर्टिंग करने के कारण पत्रकारों के पास एक स्पष्ट विजन होता है। ऐसे अनुभवी चेहरों का सदन में होना लोकतंत्र के प्रति जनता के विश्वास को और प्रगाढ़ करेगा।
पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम संदेश
साथियों, लोकतंत्र केवल चुनाव के समय वोट डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन निर्णयों का हिस्सा बनने के बारे में भी है जो हमारे भविष्य की नींव रखते हैं। अब समय आ गया है कि हम केवल कलम के जरिए आवाज न उठाएं, बल्कि अपनी आवाज को संसद के पटल तक ले जाने का संकल्प लें।
यह मांग किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण के लिए है। हमें इस मांग को एक ‘जन-आंदोलन’ का रूप देना होगा। अपने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिक समाज के मंचों पर इस चर्चा को प्रमुखता से उठाएं। याद रखें, लोकतंत्र में बदलाव की शुरुआत मांग से होती है और उसका अंत संवैधानिक सुधार में।
‘मीडिया की मेज’ अब केवल प्रेस गैलरी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, इसे नीति-निर्माण की मुख्य मेज का हिस्सा बनना ही होगा।
आइए, मिलकर एक नई लोकतांत्रिक इबारत लिखने का मार्ग प्रशस्त करें।
सूचना: 23 अगस्त 2026 को लखनऊ में भारतीय मीडिया फाउंडेशन की ओर से आयोजित ‘मीडिया अधिकार महा रैली’ में इस विषय पर विस्तृत विमर्श किया जाएगा।
निवेदक-
कृष्ण माधव मिश्रा
संस्थापक सदस्य एवं केंद्रीय अध्यक्ष
केंद्रीय सलाहकार परिषद भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी।









