*फीस लूट पर ‘सिस्टम’ खामोश! नियम कागजों में कैद, निजी स्कूल बेलगाम—कलेक्टर स्तर की निष्क्रियता से अभिभावकों का आर्थिक शोषण चरम पर*

*तुर्रम सिंह राजपूत✍️*
एटा, 7 अप्रैल 2026।
उत्तर प्रदेश में निजी स्कूलों की मनमानी अब खुलेआम ‘फीस लूट’ में तब्दील हो चुकी है। फीस में बेलगाम बढ़ोतरी, अभिभावकों को स्कूल से ही किताबें-ड्रेस खरीदने की जबरदस्ती और सरकारी नियमों की लगातार अनदेखी के बावजूद जिला प्रशासन पूरी तरह निष्क्रिय नजर आ रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अभिभावक आर्थिक शोषण के दलदल में फंसते जा रहे हैं, जबकि कलेक्टर स्तर पर सख्ती का कोई ठोस असर जमीन पर दिखाई नहीं देता।
राज्य सरकार द्वारा लागू Uttar Pradesh Self-Financed Independent Schools (Fee Regulation) Act, 2018 और उसके संशोधनों के तहत निजी स्कूलों पर स्पष्ट नियम और सीमाएं तय हैं, लेकिन अधिकांश जिलों में इनका पालन केवल कागजों तक सीमित रह गया है। शिकायतों के अंबार के बावजूद कार्रवाई के नाम पर महज नोटिस और पत्राचार तक सीमित रहना प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
*नियमों की खुलेआम धज्जियां*
सरकारी प्रावधानों के अनुसार:
फीस वृद्धि CPI + अधिकतम 5% तक सीमित होनी चाहिए, और 3 साल में कुल 10% से अधिक नहीं।
सत्र के बीच फीस बढ़ाना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
अभिभावकों को किसी एक दुकान से किताबें, यूनिफॉर्म या अन्य सामग्री खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
हर स्कूल को 60 दिन पहले फीस संरचना सार्वजनिक करनी अनिवार्य है।
इसके बावजूद जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। कई स्कूल अभिभावकों पर दबाव बनाकर अपनी तय दुकानों से ही महंगे दामों पर सामग्री खरीदने को मजबूर कर रहे हैं। फीस संरचना में पारदर्शिता का अभाव है और मनमाने चार्ज वसूले जा रहे हैं।
*शिकायतें बहुत, कार्रवाई शून्य*
जिलों में गठित जिला फीस रेगुलेटरी कमिटी—जिसकी अध्यक्षता कलेक्टर करते हैं—का अस्तित्व केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। अभिभावक संघों और व्यक्तिगत शिकायतकर्ताओं द्वारा डीआईओएस और कमिटी के पास लगातार शिकायतें दर्ज कराई जा रही हैं, लेकिन:
न तो अवैध वसूली गई फीस वापस कराई जा रही है
न ही स्कूलों पर प्रभावी जुर्माना लगाया जा रहा है
और न ही मान्यता रद्द करने जैसी सख्त कार्रवाई हो रही है
गौतमबुद्ध नगर और कानपुर जैसे जिलों में हालिया चेतावनियां जरूर जारी हुईं, लेकिन पूरे प्रदेश में व्यापक स्तर पर सख्ती का अभाव साफ दिखता है।
*सजा के प्रावधान भी बेअसर*
नियमों के तहत:
पहली बार उल्लंघन पर ₹1 लाख तक जुर्माना और फीस वापसी
दूसरी बार ₹5 लाख तक जुर्माना
बार-बार उल्लंघन पर मान्यता रद्द तक का प्रावधान
लेकिन सवाल यही है—जब कार्रवाई ही नहीं होगी, तो इन प्रावधानों का क्या मतलब?
*बड़े सवाल, जवाब गायब*
क्या हर जिले में फीस रेगुलेटरी कमिटी सक्रिय रूप से काम कर रही है?
कितने स्कूलों से अवैध फीस वापस कराई गई?
कितनों पर जुर्माना लगा या मान्यता रद्द हुई?
आखिर कब तक अभिभावकों का शोषण यूं ही चलता रहेगा?
*अभिभावकों के लिए जरूरी सलाह*
विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावक अपने अधिकारों को समझें और:
फीस संरचना की लिखित मांग करें
जबरन खरीदारी के खिलाफ आवाज उठाएं
जिला फीस रेगुलेटरी कमिटी में शिकायत दर्ज कराएं
हर भुगतान की रसीद जरूर लें
*निष्कर्ष*
स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए बने सख्त कानून केवल कागजों में कैद होकर रह गए हैं। जब तक कलेक्टर स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी और जमीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक अभिभावकों का आर्थिक शोषण रुकना मुश्किल है।
अब देखना यह है कि प्रशासन कब नींद से जागेगा—या फिर ‘फीस लूट’ का यह खेल यूं ही चलता रहेगा।







