*हनुमान गढ़ी, अयोध्या – सटीक इतिहास*
अयोध्या के मध्य में स्थित सिद्धपीठ श्री हनुमान गढ़ी मंदिर को अयोध्या का द्वारपाल कहा जाता है। मान्यता है कि बिना हनुमान जी की अनुमति के राम लला के दर्शन पूरे नहीं होते।
*1. मंदिर का मूल स्वरूप*
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान राम रावण पर विजय के बाद अयोध्या लौटे, तो हनुमान जी को इसी ऊँचे टीले पर रहने की जगह दी गई थी, ताकि वे रामकोट की रक्षा कर सकें। इसी कारण इसे हनुमान गढ़ / हनुमान कोट कहा गया। यहाँ बाल हनुमान जी 6 इंच की मूर्ति में अपनी माता अंजनी की गोद में बैठे हैं।
*2. आज के मंदिर का निर्माण किसने करवाया?*
इतिहासकारों और मंदिर के अभिलेखों के अनुसार आज के भव्य मंदिर का निर्माण *18वीं सदी में अवध के नवाब ने करवाया था।*
– विकिपीडिया और स्थानीय दस्तावेजों में निर्माता का नाम *महंत बाबा अभयरामदास जी* के साथ *नवाब शुजाउद्दौला / मंसूर अली खान* लिखा है।
– कुछ ग्रंथों में इसे *नवाब सिराजुद्दौला* के काल में बना बताया गया है।
कथा इस प्रकार है – नवाब के पुत्र को एक असाध्य रोग हो गया था, बड़े-बड़े हकीम ठीक नहीं कर पाए। तब हनुमान गढ़ी के महंत बाबा अभयरामदास जी ने प्रार्थना की और पुत्र स्वस्थ हो गया। कृतज्ञ नवाब ने ना केवल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, बल्कि ताम्रपत्र पर *52 बीघा भूमि* मंदिर को दान में दी और मंदिर के चारों ओर सुरक्षा के लिए किले जैसी दीवारें बनवाईं।
इसमें *मुगलकालीन और नागर शैली* दोनों का मिश्रण है।
*3. मंदिर की विशेषताएं*
– मंदिर तक पहुंचने के लिए *76 सीढ़ियां* चढ़नी पड़ती हैं।
– मंदिर में दक्षिणमुखी हनुमान जी हैं।
– मंदिर का प्रबंधन *रामानंदी संप्रदाय के निर्वाणी अनी अखाड़े* के बैरागी महंतों के पास है।
– मंदिर की दीवारों पर हनुमान चालीसा की चौपाइयां लिखी हैं।
*निष्कर्ष:* हनुमान गढ़ी का स्थान त्रेता युग का है, पर वर्तमान संरचना का निर्माता अवध का नवाब है, जिसने संत अभयरामदास जी के निर्देश पर इसका निर्माण कराया।















