सुरक्षा का बढ़ता घेरा या अपनों से बढ़ती दूरी? सोचना जरूरी है!
आगरा।सुरक्षा बेशक जरूरी है, लेकिन वह ऐसी न हो कि अपनों के आने के रास्ते ही बंद कर दे। घर ईंट-पत्थरों और गार्डों से नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट से चलते हैं। समय रहते जागिए, ताकि सुरक्षा की यह दीवार हमारे आत्मीय नातों को न निगल जाए।
आजकल सोसायटियों, कॉलोनियों और बड़े घरों में सामूहिक रूप से सिक्योरिटी टीम (सुरक्षा गार्ड) रखने का चलन तेजी से बढ़ा है। तकनीकी रूप से देखें तो इसने सुरक्षा का माहौल बेहतर किया है, लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा और बेहद चिंताजनक पहलू भी सामने आ रहा है।
सुरक्षा के नाम पर तैनात ये दल अब अनजाने में हमारे सामाजिक रिश्तों की ‘दीवार’ बनते जा रहे हैं। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में हमारे और हमारे करीबियों के बीच के आत्मीय नाते पूरी तरह खत्म हो जाएंगे।
नौकर नहीं, रक्षक हैं: मानसिकता बदलने की जरूरत
अक्सर देखा जा रहा है कि घर के बड़े या बच्चे इन सुरक्षाकर्मियों को अपना निजी नौकर समझ बैठते हैं। उन्हें हर छोटे-बड़े काम के लिए आदेश दिए जाते हैं और गृहस्वामी खुद निश्चिंत होकर आराम फरमाते हैं। हमें यह समझने की जरूरत है कि वे सुरक्षा दल हमारे ‘रक्षक’ हैं, ‘घरेलू नौकर’ नहीं। जब हम उनके काम का स्वरूप बदल देते हैं, तो व्यवस्था में खोट आना लाजमी है।
रूखे व्यवहार से टूटते सामाजिक संबंध
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान हमारे मेहमानों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को उठाना पड़ रहा है:
• बिना मिले लौटना: कई बार ये सुरक्षाकर्मी गृहस्वामी से बिना ठीक से बात कराए ही आगंतुकों को गेट से लौटा देते हैं।
• कठोर शब्दावली: इन सुरक्षाकर्मियों की भाषा और लहजा अक्सर इतना रूखा या संदेहास्पद होता है कि आने वाला व्यक्ति अपमानित महसूस करता है। नतीजा यह होता है कि लोग यह कहकर चले जाते हैं—”अब आए सो आए, दोबारा इस घर नहीं आएंगे।”
• रिसेप्शन का मकड़जाल: जितने ज्यादा सुरक्षा घेरे और रिसेप्शन, उतनी ही औपचारिकताएं। इससे अपनों का घर ही ‘अजनबी और भारी’ लगने लगता है।
• विवाद और झगड़े: बात-बात पर पूछताछ और कड़े रवैये के कारण आए दिन मुख्य द्वार पर मेहमानों और सुरक्षाकर्मियों के बीच बहस या झगड़े देखने को मिलते हैं।
अभी समस्या नहीं माना जा रहा, पर भविष्य गंभीर है
फिलहाल इस विषय को एक गंभीर समस्या के रूप में नहीं देखा जा रहा है। लोग इसे केवल ‘अति-सुरक्षा’ या ‘प्रोटोकॉल’ मानकर नजरअंदाज कर रहे हैं। लेकिन याद रखिए, जिस समाज में मिलने-जुलने की सहजता खत्म हो जाती है, वहाँ धीरे-धीरे एकाकीपन पैर पसार लेता है। अगर यही हाल रहा, तो भविष्य में हमारे सुख-दुख में खड़े होने वाले लोग हमारे पास नहीं फटकेंगे।
सुझाव: कैसे सुधारें यह माहौल?
इस सामाजिक नुकसान से बचने के लिए गृहस्वामियों और सोसायटियों को कुछ सजग कदम उठाने होंगे:
• सॉफ्ट स्किल्स की ट्रेनिंग: सुरक्षा एजेंसियों से बात कर गार्ड्स को केवल सुरक्षा की ही नहीं, बल्कि आगंतुकों से विनम्रतापूर्वक बात करने (सॉफ्ट स्किल्स) की ट्रेनिंग भी दिलवाई जाए।
• बच्चों को दें संस्कार: घर के बच्चों को सिखाएं कि वे सुरक्षाकर्मियों का सम्मान करें, उन्हें आदेश न दें।
• डिजिटल अनुमति का सही उपयोग: आजकल कई ऐप्स मौजूद हैं। सुरक्षा गार्ड को सीधे मना करने का अधिकार देने के बजाय, गृहस्वामी को ऐप या कॉल के जरिए खुद मेहमान से बात कर निर्णय लेना चाहिए।
• सजगता और संवाद: यदि कोई मेहमान आपके घर आने से कतराने लगा है, तो उससे खुलकर बात करें। कहीं इसकी वजह आपके घर का सुरक्षा घेरा तो नहीं, यह जरूर जानें।















