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विशेष श्रद्धांजलि: सामूहिक पत्रकारिता के पुरोधा और पारखी संपादक आर.बी. सिंह यादव को नमन शंकर देव तिवारी

विशेष श्रद्धांजलि: सामूहिक पत्रकारिता के पुरोधा और पारखी संपादक आर.बी. सिंह यादव को नमन
शंकर देव तिवारी
नई खोज और खोजी पत्रकारिता को बढ़ावा देने वाले तथा हर पत्रकार की मेहनत को उसका पूरा हक दिलाने के पक्षधर वरिष्ठ संपादक आर.बी. सिंह यादव अब हमारे बीच नहीं रहे। ‘विकासशील भारत’ और ‘आज’ समाचार पत्र में पिछले चार दशकों से उन्हें करीब से देखने-सुनने का अवसर मिला। हम दोनों ही संस्थानों में लंबे समय तक सहकर्मी रहे। साल 2005 में वैचारिक भिन्नताओं और कुछ परिस्थितियों के कारण जब हमने ‘आज’ अखबार को अलविदा कहा, तो फिर ऐसा छूटा कि दोबारा मिलना नहीं हो सका। लेकिन उनकी यादें और उनके साथ काम करने के अनुभव आज भी जीवंत हैं।
उनकी पारखी नजर और खोजी पत्रकारिता को बढ़ावा देने का एक अविस्मरणीय वाकया साल 1993 का है। जब मैं बाह क्षेत्र से ‘अमर उजाला’ के बाद ‘आज’ अखबार का संवाददाता बना, तब एक दिन यादव जी का एक पत्र मुझे मिला। उस पत्र में द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने वाले बाह क्षेत्र के दो भारतीय सैनिकों के नाम थे। यादव जी ने मुझसे उन सैनिकों से बात कर एक विशेष रिपोर्ट भेजने का अनुरोध किया था।
जब मैंने इस पर धरातल पर काम शुरू किया, तो बाह तहसील से ऐसे 2 दो नहीं, बल्कि 12 सैनिक जीवित मिले। उस समय उन सैनिकों ने बताया था कि इस सेना का नेतृत्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया था। सैनिकों ने जो संस्मरण और जानकारियां साझा कीं, वह मूल विषय से कहीं आगे की थीं, लेकिन पत्रकारिता के लिहाज से एक बड़ी खबर थीं। मैंने वह सारी अनसुनी कहानियां विस्तार से लिखकर उन्हें भेज दीं।
अगर उनकी जगह कोई और रूढ़िवादी संपादक होता, तो शायद वह अपने भेजे गए दो नामों और सीमित विषय तक ही टिके रहने का दबाव बनाता। लेकिन आर.बी. सिंह यादव एक अलग मिट्टी के बने थे। उन्होंने मेरी रिपोर्ट की अहमियत को समझा, दो दिन का इंतजार किया और अखबार में उस ऐतिहासिक खोजी खबर को पूरा पेज (Full Page) दिया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे सामूहिक श्रेय के बजाय व्यक्तिगत मेहनत का सम्मान करते थे। उस पूरे पेज के अंत में किसी सामूहिक नाम की जगह, उन्होंने लेखक के तौर पर मेरा नाम दिया।
उनका बड़प्पन और काम के प्रति निष्ठा तब भी दिखी, जब उन्होंने ‘आज’ अखबार के बनारस ब्यूरो का कार्यभार संभाला था। उस समय संस्थान में कुछ अदालती विवाद चल रहे थे और मैं बिना किसी पूर्व सूचना या तय माध्यम के सीधे बनारस पहुंच गया था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने मेरी प्रतिभा पर भरोसा किया और मुझे सिटी प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी।
आज आर.बी. सिंह यादव जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पत्रकारिता में उनका योगदान, सहकर्मियों को आगे बढ़ाने की उनकी कला और खोजी खबरों के प्रति उनका जुनून हमेशा याद किया जाएगा।
अखबार को पठनीय बनाने और हर कलमकार को उसका हक देने वाले ऐसे महान संपादक को भावभीनी श्रद्धांजलि।
ॐ शांति! ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।

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