विशेष खबर पर, पढ़ लिखकर नई खोज खबर पर सामूहिक काम करने वाले जिसकी मेहनत उसको पूरा मौका देने के पक्ष धर आर बी सिंह यादव नहीं रहे. विकास शील भारत और आज़ में ही हमने पिछले चार दशकों से देखा सुना. दोनों ही संस्थाओं में हम साथ रहे. 2005 में हमने विचारों भिन्नता वस उपदेश के छोड़ने के कारण छोड़ा आज़ छोड़ा तो फिर कल नहीं हुआ..फिर कभी नहीं मिले…..
ज़ब बाह में 93के बाद अमर उजाला से आज़ का संवाददाता बाह से बना तभी एक दिन यादव जी का पत्र मिला दूसरे विश्व युद्ध में भारतीय सैनिक लड़े थे उनके नाम थे पत्र में जो सख्या में दो थे से बात कर भेजने का अनुरोध था. मगर ज़ब मैंने काम शुरु किया तो बाह तहसील से 12लोग जीवित मिले. उस समय इस सेना का नेतृत्व सुभाष बोस का ही बताया गया. उन सेनिकों ने जो बताया वह विषय से आगे का था मगर खबर था. मैंने उन्हें सब लिख डाला. और कोई होता तो वो अपने भेजे नाम और विषय तक सीमित रहते. उन्होंने दो दिन रूककर पूरा पेज़ दिया. अंत में सामूहिक नाम की जगह जो जिशने लिखा उसका नाम था.
आज़ वो नहीं हैं. ज़ब कार्यभार संभाला उन्होने आज़ का तब मैं भी बिना लाइन के वनारस जा पंहुँचा था. तब ये अदालत में आज़ के विरुद्ध थे. तब उन्होंने मूझे सिटी प्रभारी बनाया. नमन ॐ शांति भगवान उनकी आत्मा को अपनी सेवा में ले.















