*वर्दी के साये में कुचली गई कलम की ताकत!*
*सवाल पूछना जुर्म है? दिल्ली में खाकी का तांडव!*
दिल्ली के साकेत में एक अस्पताल के उद्घाटन के दौरान जो कुछ हुआ, वह महज दो महिला पत्रकारों और पुलिस के बीच का कोई मामूली विवाद नहीं है। यह एक नग्न सत्य है, जो उस हर आवाज का गला घोंटने की कोशिश को उजागर करता है जो इस देश में सच बोलने की हिम्मत रखती है। केंद्रीय गृह मंत्री और मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को कवर करने पहुंचीं 4PM न्यूज नेटवर्क की दो निडर महिला पत्रकारों के साथ जिस तरह का अमानवीय बर्ताव किया गया, उसने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या इस देश में सवाल पूछना गुनाह बन गया है?
पुलिस अपनी सफाई में रास्ता रोकने और वीवीआईपी सुरक्षा का बेतुका हवाला दे रही है, लेकिन सच इसके ठीक उलट है। यह कोई नई बात नहीं है। जब-जब कोई पत्रकार सत्ता की चकाचौंध के पीछे छिपे अंधेरे को बेनकाब करने की कोशिश करता है, तब-तब वर्दी और व्यवस्था का गठजोड़ मिलकर उसे कुचलने क्यों दौड़ पड़ता है?
पत्रकारिता कोई बिकाऊ बाज़ार का सामान नहीं है, बल्कि यह समाज की अंतरात्मा को जगाने वाला एक पवित्र मिशन है। आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक, जब भी देश को दिशा की जरूरत पड़ी, पत्रकारों ने अपनी कलम की स्याही से इंकलाब लिख दिया। एक तरफ वे जांबाज पत्रकार हैं जो जमीन की धूल फांककर, बिना किसी सरकारी संरक्षण और विज्ञापन के लालच के सच को जनता तक पहुंचाते हैं, तो दूसरी तरफ वे लोग हैं जो सत्ता की गोद में बैठकर चापलूसी को ही अपना परम धर्म मान बैठे हैं। सत्ता के गलियारों में बैठे चापलूस हमेशा यही चाहते हैं कि असली सच कभी हुक्मरानों के कानों तक न पहुंचे।
कलम की ताकत क्या होती है, इसका इतिहास गवाह है। वर्ष 1977 में जब कर्नाटक की तत्कालीन सरकार के खिलाफ पत्रकारों ने अपनी एकजुट कलम उठाई थी, तब उस ताकत के आगे पूरी सत्ता को झुकना पड़ गया था। जब कलम का सिपाही एकजुट होता है, तो बड़े-बड़े सिंहासन डोल जाते हैं। शायद इसी असली ताकत से डरी हुई व्यवस्था आज निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारों को डराना और धमकाना चाहती है।
पत्रकारिता का कोई मजहब, कोई जाति या कोई वर्ग नहीं होता। जब एक पत्रकार अपनी कलम उठाता है, तो वह हर तरह के भेदों और दीवारों को पीछे छोड़कर केवल और केवल इंसानियत और सच के पक्ष में खड़ा होता है। लेकिन बेहद शर्मनाक बात तो यह है कि उस निडर महिला पत्रकार को केवल उसकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग की वजह से प्रताड़ित ही नहीं किया गया, बल्कि उसे धर्म और जात के दायरे में घसीटकर पीटा गया। यह सिर्फ एक पत्रकार पर हमला नहीं है, बल्कि देश की उस गंगा-जमुनी तहजीब और संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है।
आज पत्रकारिता की इस दुर्दशा पर हर उस शख्स की आंख नम है जो इस देश के लोकतंत्र से प्यार करता है। सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने क्या कहा या प्रशासन का क्या तर्क था, असली सवाल यह है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को इस तरह सरेआम पैरों तले क्यों रौंदा जा रहा है? वक्त आ गया है कि सरकारें यह समझें कि चापलूसों की झूठी तारीफें भले ही उन्हें कुछ पल का सुकून दे सकती हैं, लेकिन समाज का असली आईना वही पत्रकार दिखाते हैं जो जमीन पर खड़े होकर निडर होकर सच लिखते हैं।
जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर तत्काल कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और थाने की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। यदि इस ज्यादती पर न्याय नहीं मिला, तो यह लड़ाई हाईकोर्ट तक जाएगी, क्योंकि वर्दी कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
आज पूरा मीडिया जगत और *’पत्रकार संवाद मंच’* उन महिला पत्रकारों के साथ चट्टान की तरह खड़ा है। भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए चाहे जितने हथकंडे अपनाए जाएं, लेकिन कलम के सिपाहियों का हौसला न कभी झुका था और न कभी झुकेगा। सच लिखने की यह सजा भले ही कठिन हो, लेकिन यह तय है कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, कलम की एक किरण उसे चीरकर ही दम लेगी।
पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अब केवल दिलासा या आश्वासन नहीं, बल्कि कड़े कानूनों की सख्त जरूरत है, ताकि कोई भी ताकतवर शख्स या महकमा कलम की आवाज को जबरन खामोश न कर सके। अगर आज हम इस ज्यादती पर खामोश रहे, तो कल कोई भी सच बोलने वाला इस देश में सुरक्षित नहीं बचेगा। यह साकेत कांड केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है-लोकतंत्र के लिए!
*संवाददातामोहम्मद सैफ (साबरी)*
*मान्यता प्राप्त पत्रकार*
*राष्ट्रीय महासचिव-पत्रकार संवाद मंच*
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