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बोर्ड प्रस्ताव नहीं, फिर भी उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड ने डिस्कॉमों के नाम पर छूट माँग ली। संख्या घटी, नेता डेढ़ लाख बताते हैं। चुनाव से पहले आक्रोश की आशंकाBMF News

*बोर्ड प्रस्ताव नहीं, फिर भी उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड ने डिस्कॉमों के नाम पर छूट माँग ली। संख्या घटी, नेता डेढ़ लाख बताते हैं। चुनाव से पहले आक्रोश की आशंका।*

लखनऊ। *कुर्सी बदली, चिट्ठी नहीं बदली। जैसे फाइल का कार्बन कॉपी निकाल लिया हो*। *उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन के दो प्रबंध निदेशकों ने आउटसोर्स सेवा निगम से छूट तीन बार माँगी, और हर बार संख्या थोड़ी और काट दी। पंकज कुमार ने 19 दिसंबर 2025 को करीब 78,000 लिखे, 31 मार्च 2026 को करीब 75,000। नितीश कुमार ने 11 सितंबर 2026 को करीब 73,500। तीनों पत्र 33/11 केवी उपकेंद्रों के 839 अनुबंधों पर टिके हैं*। *डिस्कॉम बोर्ड का एक भी प्रस्ताव साथ नहीं है। शायद बोर्ड को पूछना बेअदबी समझा गया। कर्मचारी नेता कहते हैं कि उपकेंद्र, मीटर रीडिंग, ट्रांसफॉर्मर वर्कशॉप और शक्तिभवन से क्षेत्रीय दफ्तरों तक मिलाकर बिजली के आउटसोर्स कर्मी करीब डेढ़ लाख हैं*।

*प्रबंधन सिर्फ उपकेंद्र के 73,500 गिना रहा है। बाकी आदमी शायद बिजली के खंभे पर नहीं, कागज के हाशिये पर खड़े हैं।*

*रास्ता और भी सुंदर है। कार्पोरेशन का अध्यक्ष और ऊर्जा विभाग का प्रमुख एक ही व्यक्ति है। 21 सितंबर 2026 के स्थानांतरण के बाद दोनों कुर्सियाँ प्रमुख सचिव (ऊर्जा एवं अपर ऊर्जा स्रोत) रणवीर प्रसाद के पास हैं। वे उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड, उत्तर प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कार्पोरेशन लिमिटेड, उत्तर प्रदेश राज्य भार प्रेषण केंद्र और उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम के अध्यक्ष भी हैं। एक तरफ अध्यक्ष बनकर प्रस्ताव बनता है। दूसरी तरफ विभाग का प्रमुख बनकर वही प्रस्ताव आगे बढ़ सकता है*।

*खुद से खुद को चिट्ठी लिखने का शिष्ट तरीका*।

नितीश कुमार का पत्र संख्या 1/64660/2026 सीधे ऊर्जा विभाग के प्रमुख को है। पंकज कुमार के दोनों पत्रों की प्रतिलिपि भी उसी मेज पर गई। आपत्ति कौन लिखे, जब सुनने वाला और भेजने वाला एक ही कुर्सी से जुड़ा हो।

*इलाहाबाद हाईकोर्ट 18 जनवरी 2010 को यही द्वंद्व रोक चुका है। जस्टिस वी.एम. सहाय और जस्टिस वी.के. दीक्षित की खंडपीठ ने कार्यकारी अभियंता प्रदीप कुमार जैन की याचिका पर सरकार को आदेश दिया कि ऊर्जा सचिव और कार्पोरेशन के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक दो अलग अधिकारी हों। तब दोनों कुर्सियाँ आईएएस नवनीत सहगल के पास थीं। अदालत ने स्थानांतरण पर रोक लगाई और कहा कि मामला नई स्वतंत्र समिति के बाद गुण-दोष पर देखा जाए।*

*आज फिर प्रबंध निदेशक अलग हैं, नितीश कुमार। अध्यक्ष और ऊर्जा विभाग के प्रमुख फिर एक हैं। 2010 का आदेश शायद फाइल में कहीं दब गया। वैसे अवमानना का फैसला अदालत करेगी। पत्रकार पूछ सकता है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उस आदेश से आँख क्यों चुरा रहे हैं।*

नितीश कुमार 2010 बैच के हैं। अप्रैल 2026 में पंकज कुमार के केंद्र प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद इस कुर्सी पर आए। पंकज कुमार 2002 बैच के हैं, अब ऊर्जा मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं। पत्र में श्रम विभाग के 17 अप्रैल 2026 के आदेश के बाद वेतन पर सालाना खर्च करीब 1,769 करोड़ लिखा है। निगम की दरों पर, कुशल को 22,000 और अकुशल को 20,000 रुपये, यह करीब 2,549 करोड़ हो सकता है। अंतर लगभग 780 करोड़ है। *स्नातक योग्यता से अनुभवी आईटीआई और आरपीएल कर्मियों के हटने, औद्योगिक अशांति और दुर्घटना का खतरा भी लिखा है। मीटर रीडर, कंप्यूटर ऑपरेटर, चपरासी और वर्कशॉप इस खाते में नहीं हैं। 28 सितंबर 2026 की खबर में करीब 60,000 मीटर रीडरों का जिक्र है। शक्तिभवन के संविदा कर्मी सार्वजनिक खबर में 114 हैं। अकेले मीटर रीडर कार्पोरेशन के पूरे आँकड़े के पास पहुँच जाते हैं। गिनती ऐसी कि छूट सस्ती पड़े और 780 करोड़ का भार भी छोटा दिखे।*

मंत्री एक बात कह रहे हैं, पत्र दूसरी। 2 जून 2026 को *ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने समीक्षा बैठक में कहा कि हजारों आउटसोर्स कर्मियों की छँटनी के बाद बड़ी कमी हो गई है, एक कर्मचारी पर चार के बराबर भार है, दुर्घटनाएँ बढ़ रही हैं, और बिना उचित कारण किसी संविदा कर्मी को न हटाया जाए। विधानसभा में स्थायी करने का सवाल उठ चुका है। विधायक फील्ड की कमी बताते रहे हैं। पत्र उलटी दिशा में हैं। छूट माँगी गई है, ताकि पुरानी एजेंसी व्यवस्था जारी रहे। जमीन पर आदमी कम है। कागज पर आदमी और कम कर दिया गया।*

*सवाल यहीं से तीखा होता है। पुरानी व्यवस्था बची रही, तो पुराने ठेकेदार भी बचे रहेंगे। 149 वितरण मंडलों में जेम से जो एजेंसियाँ चुनी गई हैं, वही अनुबंध खत्म होने पर फिर से अपने स्तर पर चलाने की इजाजत माँगी गई है। नया निगम एजेंसी खुद सूचीबद्ध करता। छूट मिलते ही वह दरवाजा बंद रहता है।* आशंका है कि चहेती एजेंसियों के टेंडर इसी देरी में जिंदा रखे जा रहे हैं। वक्त पर टेंडर क्यों नहीं निकलते। अनुबंध खत्म होने देते क्यों हैं, फिर तत्काल जरूरत का हवाला देकर पुरानी एजेंसी को बढ़ा देते क्यों हैं। पत्र में लिखा है कि जनशक्ति की कमी से अनुबंध कम समय में पूरे करने पड़ते हैं। देरी अगर व्यवस्था की आदत है, तो छूट उसी आदत की ढाल बन सकती है। यह आशंका है। चिट्ठी में किसी ठेकेदार का नाम नहीं है। वैसे नाम न लिखना भी एक कला है।

*उम्र का नियम और भी सुंदर है*। *नियमित कर्मी 60 पर रिटायर होते हैं। कार्पोरेशन आउटसोर्स को 55 पर हटा रहा है*।

*फरवरी 2025 में मध्यांचल के प्रबंध निदेशक भवानी सिंह खंगारौत के आदेश का हवाला खबरों में है: सबस्टेशन और एचटी-एलटी लाइन पर अधिकतम उम्र 55, उसके बाद काम न लिया जाए। मार्च 2025 में पूर्वांचल की ओर से भी 55 से ऊपर के आउटसोर्स कर्मियों को हटाने का निर्देश छपा । संघ करीब 10,000 ऐसे लोगों की बात करता है, जो 15–20 साल से काम कर रहे थे। जून 2024 में ऊर्जा विभाग ने रबर स्टैम्प निदेशकों का कार्यकाल 62 से 65 तक कर दिया। खंभे पर चढ़ने वाला 55 पर जाए। कुर्सी पर बैठने वाला 65 तक रहे। कंपनी अधिनियम में प्रबंध निदेशक की सामान्य छत 70 है। उम्र भी पद के हिसाब से बढ़ती है।*

*डिस्कॉम इस चिट्ठी में कहीं नहीं बोलते। पूर्वांचल, मध्यांचल, पश्चिमांचल, दक्षिणांचल और केस्को अलग कंपनी हैं अनुबंध मंडल स्तर पर उनके नाम से होते हैं। निजीकरण के वक्त बोर्ड प्रस्ताव पास कराया गया था। यहाँ वह कागज इसमें नहीं है।*

 

*आशंका अब पत्रों से मजबूत होती है कि डिस्कॉमों के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी अपनी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट देखते हैं, और अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक जो चाहें लिख देते हैं। जैसा चाहेंगे, वैसी मुहर लग जाएगी। ये रबर स्टैम्प बनकर रह गए हैं। स्याही अध्यक्ष के पास है, छाप डिस्कॉम के पास*।

*तीन पत्रों में बोर्ड का प्रस्ताव न होना, और अध्यक्ष व ऊर्जा विभाग के प्रमुख का एक होना, इस सवाल को टालने नहीं देता।*

*संघ छूट नहीं, शामिल करना चाहता है। प्रदेश महामंत्री देवेंद्र कुमार पांडेय ने 16 फरवरी को प्रमुख सचिव (सचिवालय प्रशासन) को और *3 अप्रैल को महानिदेशक, आउटसोर्स सेवा निगम को लिखा। आरोप हैं कि सुरक्षा उपकरण नहीं मिलते, दुर्घटना पर कार्रवाई नहीं होती, 15 मई 2017 के आसपास करीब 15,000 कर्मी हटाए गए, और ईपीएफ जमा नहीं होता। *जून 2026 की खबर में अक्टूबर 2024 की कटौती में हटाए गए करीब 25,000 की बहाली की माँग दर्ज है। उसी महीने 49 दिनों में 56 दुर्घटनाएँ और 30 मौतों का आँकड़ा छपा।*

*मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2 सितंबर 2026 को आउटसोर्स सेवा निगम खोला था। मानदेय 20 से 40 हजार और सीधे खाते में वेतन का वादा था। कार्पोरेशन उसी व्यवस्था से बाहर रहना चाहता है। निगम कर्मियों के लिए खुला। कार्पोरेशन अपने लिए बंद रखना चाहता है।*

 

*पैसा भी एक सिरे से नहीं जाता ।1,769 करोड़ उपकेंद्र-लाइन के वेतन का बताया गया है*। *बिलिंग एजेंसी को बिल बनाने और वसूली के प्रतिशत पर भुगतान होता है। मीटर रीडर की मजदूरी एजेंसी अपने बिल में से काटती है*। *दफ्तर और वर्कशॉप तीसरी मद हैं। ये सब डिस्कॉम के राजस्व से निकलते हैं, जो उपभोक्ता के बिल और सरकारी सब्सिडी से बनता है*। *हो सकता है कि अधूरी गिनती शोषण ढक रही हो। हो सकता है कि एजेंसी के बिल और मजदूरी का फर्क किसी रिसाव को छुपा रहा हो*। *हो सकता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संविदा कर्मियों का आक्रोश सत्ताधारी दल को नुकसान पहुँचाए। पत्रों में न पार्टी है, न घोटाले का आँकड़ा*। *दोनों लेखक उसी सरकार के नियुक्त प्रबंध निदेशक हैं।*

*सवाल अब सीधे हैं। 2010 में अदालत ने ऊर्जा सचिव और कार्पोरेशन प्रमुख को अलग किया था। आज दोनों फिर एक हैं। मंत्री कमी मानते हैं, पत्र छूट माँगते हैं। 73,500 में मीटर रीडर, वर्कशॉप और दफ्तर क्यों नहीं। 55 और 65 एक ही निगम में कैसे चल रहे हैं। डिस्कॉम बोर्ड चुप क्यों है।*

 

अधिकारी वक्त पर टेंडर निकलने से क्यों बचे रहते हैं। आशंका जाहिर की जा सकती है। अवमानना का फैसला अदालत का है। जवाब कार्पोरेशन और ऊर्जा विभाग को देना है। जवाब आए, तब मजा और बढ़ेगा। खैर

 

*युद्ध अभी शेष है।*

 

 

*अविजित आनन्द, संपादक, समय का उपभोक्ता, राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र, लखनऊ, और विस्पर आफ अन्टोल्ड, हिंदी-अंग्रेजी मासिक पत्रिका। चन्द्रशेखर सिंह, प्रबंध संपादक, समय का उपभोक्ता, राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र, लखनऊ*

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