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पत्नी द्वारा स्वेच्छा से छोड़े गए भरण-पोषण के दावों को बाद की घरेलू हिंसा की कार्यवाही के माध्यम से पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट, रिपोर्ट आयुष भारद्वाज एडवोकेट

_ पत्नी द्वारा स्वेच्छा से छोड़े गए भरण-पोषण के दावों को बाद की घरेलू हिंसा की कार्यवाही के माध्यम से पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और घरेलू हिंसा से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी ने आपसी समझौते के तहत स्वेच्छा से अपने सभी आर्थिक एवं भरण-पोषण संबंधी दावों को छोड़ दिया है और उसके बाद आपसी सहमति से तलाक भी प्राप्त कर लिया है, तो वह बाद में उन्हीं पुराने दावों को घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act), 2005 के तहत दोबारा नहीं उठा सकती।

 

मामले की पृष्ठभूमि:

 

इस मामले में पति और पत्नी के बीच 23 जुलाई 2016 को एक समझौता हुआ था, जिसके तहत पत्नी ने पति के विरुद्ध भविष्य में कोई आर्थिक या भरण-पोषण संबंधी दावा नहीं करने पर सहमति जताई थी।

 

इसके बाद दोनों ने आपसी सहमति से तलाक प्राप्त किया। हालांकि, बाद में पत्नी और बेटी ने पति के विरुद्ध घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू की।

 

पति ने सुप्रीम कोर्ट में इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए कहा कि जिन दावों को पहले ही आपसी समझौते के माध्यम से समाप्त कर दिया गया था, उन्हें दोबारा उठाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

 

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी:

 

न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि जब पत्नी ने स्वेच्छा से समझौते के माध्यम से अपने सभी आर्थिक एवं भरण-पोषण संबंधी दावों को छोड़ दिया था और बाद में उन दावों को समाप्त करने वाले समझौते को चुनौती देने के लिए कोई कानूनी कार्यवाही भी नहीं की, तो पुराने विवादों को DV Act के माध्यम से पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता।

 

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि समझौते से पहले की घटनाओं के आधार पर दोबारा कार्यवाही शुरू करना, ऐसी परिस्थितियों में, न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

 

बेटी के अधिकारों पर भी दिया महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण:

 

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच हुआ समझौता बेटी के स्वतंत्र आर्थिक अधिकारों को समाप्त नहीं करता, क्योंकि बेटी उस समझौते की पक्षकार नहीं थी।

 

इसलिए बेटी को कानून के अनुसार अपने आर्थिक अधिकारों के लिए अलग से कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी गई।

 

अंतिम निर्णय:

 

सुप्रीम कोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और पत्नी द्वारा शुरू की गई घरेलू हिंसा की कार्यवाही को निरस्त कर दिया। हालांकि, बेटी के स्वतंत्र अधिकार सुरक्षित रखे गए।

 

*📌 Case Name: Reji Baby v. Subi Mary & Ors.*

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