आगरा दीवानी न्यायालय के बार हॉल के दालान का एक कोना, जहाँ आज भी एक मशीन की खटर-पटर की आवाज गूंजती है, जो अब लगभग इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। उस कोने को अपनी उपस्थिति से आबाद किए हुए हैं – सज्जन श्री भगवान गुप्ता जी।
यह कोई आम टाइपराइटर नहीं है। यह गुप्ता जी के 52 वर्षों के अटूट रिश्ते का साक्षी है। जब कंप्यूटर ने अपनी चकाचौंध से दुनिया को बदल दिया और टाइपराइटरों को कबाड़खानों में पहुँचा दिया, तब भी गुप्ता जी ने इस ऐतिहासिक धरोहर को अपनी आजीविका का सहारा बनाए रखा और इतिहास को वर्तमान में जिंदा रखा है।
बावन साल का सफर आसान नहीं होता। कई युग बीते, समय की धूल और धूप के थपेड़े सहे, लेकिन इसी टाइपिंग के कारोबार ने पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरी इज्जत और खुद्दारी के साथ पूरा कराया। यह सिर्फ रोजगार नहीं, यह एक तपस्या है।
सबसे बड़ी बात है इनकी काबिलियत। अंग्रेजी की न्यायिक शब्दावली पर ऐसी पकड़ बनाना कोई मामूली बात नहीं है। न्यायपालिका में एक स्पेलिंग की गलती से अर्थ का अनर्थ हो सकता है, लेकिन गुप्ता जी अपनी तीक्ष्ण बुद्धिमता और 52 साल के अनुभव के बल पर इस संभावना को नगण्य साबित कर देते हैं। उनकी उंगलियाँ जब टाइपराइटर के बटनों पर चलती हैं, तो केवल शब्द नहीं, बल्कि न्याय की भाषा टाइप होती है।
एक ओर जहाँ कंप्यूटराइज्ड टाइपिंग ने पुरानी मशीनों को चलन से बाहर कर दिया है, वहीं श्री भगवान गुप्ता जी इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि हुनर और ईमानदारी कभी पुरानी नहीं होती। वो आज भी आगरा बार के दालान में बैठे, अपनी उसी पुरानी मशीन के साथ, नए वकीलों को प्रेरणा दे रहे हैं कि मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं होता।
गुप्ता जी जैसे कर्मशील को मेरा सैल्यूट। ईश्वर उन्हें स्वस्थ, दीर्घायु रखे और उनका यह टाइपराइटर यूँ ही न्याय के मंदिर में अपनी खटर-पटर से गुंजायमान रहे।
आपके जज्बे को सलाम, गुप्ता जी!
Writer
टी बी जग्गी एडवोकेट













