कभी वकालत में न्यायालय की कुर्सी भी संस्कार सिखाती थी…
लगभग एक-डेढ़ दशक पहले तक वकालत के पेशे का माहौल कुछ अलग था। उसमें एक सहज अनुशासन था, एक मर्यादा थी और वरिष्ठ-कनिष्ठ के संबंधों में सम्मान की एक स्वाभाविक परंपरा थी।
किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के बराबर में खाली पड़ी कुर्सी पर बैठने से पहले कनिष्ठ अधिवक्ता सहज ही संकोच करता था। यह किसी भय या दबाव का परिणाम नहीं था। वरिष्ठ अधिवक्ता ऐसा करने पर नाराज हों या कनिष्ठ को वहां से उठा दें—ऐसी बात भी नहीं थी। बल्कि यह वरिष्ठ के प्रति सम्मान और पेशे की परंपराओं के प्रति आदर का भाव था।
स्थिति यहां तक थी कि न्यायालय कक्ष में आगे की दो-तीन पंक्तियों में कुर्सियां खाली होने के बावजूद कनिष्ठ अधिवक्ता वहां बैठने का साहस नहीं करता था। यह कोई लिखित नियम नहीं था, न ही इसके लिए किसी आदेश की आवश्यकता होती थी। यह उस समय की पेशेवर संस्कृति और संस्कारों का हिस्सा था।
यदि कोई अधिवक्ता न्यायालय में बैठा है और उससे वरिष्ठ अधिवक्ता वहां आ जाएं, तो शालीनतापूर्वक उठकर उन्हें अपनी कुर्सी पर बैठने का आग्रह करना सामान्य और स्वाभाविक व्यवहार माना जाता था।
शायद यही छोटी-छोटी बातें किसी पेशे की बड़ी संस्कृति बनाती हैं।
उस समय किसी नए अधिवक्ता की पहचान केवल उसके नाम से नहीं होती थी। उसकी पहचान यह भी होती थी कि वह किस वरिष्ठ अधिवक्ता का जूनियर है और किस चैम्बर से जुड़ा है।
न्यायालय में किसी नए चेहरे को देखकर न्यायाधीश भी कई बार सहज ही पूछ लेते थे—
“किसके जूनियर हैं आप?”
इस प्रश्न में केवल परिचय नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था और परंपरा छिपी होती थी—किसी अनुभवी अधिवक्ता के सान्निध्य में रहकर कानून सीखना, न्यायालय की कार्यप्रणाली समझना, बहस का तरीका जानना और सबसे बढ़कर इस पेशे की मर्यादा को आत्मसात करना।
लेकिन समय बदल गया है…
विधि शिक्षा का स्वरूप बदला है। विशेषकर पंचवर्षीय विधि पाठ्यक्रम के माध्यम से बड़ी संख्या में युवा इस पेशे से जुड़े हैं। यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य परिवर्तन है। नई पीढ़ी में प्रतिभा है, ऊर्जा है, तकनीक की समझ है और आगे बढ़ने का उत्साह है। अनेक युवा बहुत कम समय में अपनी प्रतिभा और ज्ञान का अच्छा प्रदर्शन भी कर रहे हैं।
लेकिन इसी बदलाव के बीच हमें थोड़ा ठहरकर स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए—
क्या हमने वकालत की रफ्तार तो बढ़ा दी, लेकिन उसकी गहराई और परंपराओं को कहीं पीछे तो नहीं छोड़ दिया?
आज कभी-कभी इसके विपरीत दृश्य भी देखने को मिलता है। कुछ मामलों में ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ युवा अधिवक्ता कुछ महीनों तक किसी चैम्बर से जुड़ने के बाद स्वयं को स्वतंत्र रूप से हर प्रकार के मुकदमे में बहस के लिए तैयार समझ लेते हैं।
और सबसे अधिक चिंताजनक बात तब लगती है, जब न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता खड़े हों और उनके लिए सीट खाली करने या उन्हें बैठने का आग्रह करने जैसी सामान्य शिष्टाचार की परंपरा भी दिखाई न दे।
यह किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना नहीं है। न ही इसका उद्देश्य पूरी नई पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करना है। यह केवल उस बदलती हुई पेशेवर संस्कृति पर आत्ममंथन है, जिसका हिस्सा हम सभी हैं।
क्योंकि वकालत केवल कानून की धाराएं पढ़ लेने का नाम नहीं है।
वकालत अनुभव है।
वकालत धैर्य है।
वकालत निरंतर अध्ययन है।
वकालत न्यायालयीन शिष्टाचार है।
वकालत वरिष्ठों से सीखने की विनम्रता है।
और सबसे बढ़कर—वकालत मुवक्किल के विश्वास की जिम्मेदारी है।
आत्मविश्वास निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन अनुभव से पहले आया हुआ अतिआत्मविश्वास कभी-कभी स्वयं अधिवक्ता से अधिक उसके मुवक्किल को नुकसान पहुंचा सकता है।
मुवक्किल हमारे पास केवल एक फाइल लेकर नहीं आता। वह अपने अधिकार, अपनी संपत्ति, अपने परिवार और कई बार अपने जीवन का महत्वपूर्ण प्रश्न लेकर आता है।
इसलिए उसे प्रभावित करने से अधिक महत्वपूर्ण है उसे सही कानूनी सलाह देना और उसके हितों की ईमानदारी से रक्षा करना।
आज शानदार चैम्बर, आधुनिक कार्यालय, बेहतर प्रस्तुति और तकनीक का उपयोग निश्चित रूप से पेशे का हिस्सा हैं। परिवार के आर्थिक सहयोग से कोई युवा अच्छा कार्यालय स्थापित करता है, इसमें भी कोई बुराई नहीं है।
लेकिन एक शानदार चैम्बर और एक शानदार अधिवक्ता के बीच का अंतर ज्ञान, अनुभव, नैतिकता, व्यवहार और पेशेवर क्षमता तय करते हैं।
मुवक्किल को आकर्षित करना गलत नहीं है, लेकिन उसे प्रभावित करने के लिए अपनी क्षमता या अनुभव को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना अंततः उसी मुवक्किल के साथ अन्याय हो सकता है।
वरिष्ठों की भी अपनी जिम्मेदारी है
नई पीढ़ी को केवल यह कहकर दोष देना भी उचित नहीं होगा कि आज के युवा परंपराओं का सम्मान नहीं करते।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे नई पीढ़ी को खुले मन से मार्गदर्शन दें, उन्हें सीखने का अवसर दें और पेशे की बारीकियों से परिचित कराएं।
वहीं कनिष्ठ अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे सीखने की प्रक्रिया को कुछ महीनों की सीमा में समाप्त न मानें।
वकालत ऐसा पेशा है जिसमें डिग्री मिलने के बाद असली शिक्षा शुरू होती है और सीखना जीवनभर चलता रहता है।
सीखने वाला कभी छोटा नहीं होता और सिखाने वाला कभी बड़ा नहीं होता—दोनों मिलकर ही पेशे को बड़ा बनाते हैं।
अब आवश्यकता व्यवस्था और संस्कृति—दोनों पर विचार करने की है
बार काउंसिल और बार एसोसिएशनों को भी इस दिशा में गंभीर पहल करनी चाहिए।
नए अधिवक्ताओं के लिए व्यवस्थित प्रशिक्षण, वरिष्ठ अधिवक्ताओं के मार्गदर्शन की व्यवस्था, न्यायालयीन आचरण एवं पेशेवर नैतिकता पर नियमित कार्यक्रम और ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए जिससे नए अधिवक्ता धीरे-धीरे अनुभव प्राप्त करते हुए इस पेशे में आगे बढ़ सकें।
यह किसी की स्वतंत्रता सीमित करने की बात नहीं है, बल्कि पेशे की गरिमा और मुवक्किल के हितों की रक्षा की बात है।
क्योंकि वकालत केवल रोजी-रोटी कमाने का माध्यम नहीं है।
यह न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
समय बदले, तकनीक बदले, विधि शिक्षा बदले, वकालत करने के तरीके बदलें—इन सबका स्वागत होना चाहिए।
लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलनी चाहिए—
वरिष्ठ का सम्मान,
कनिष्ठ के प्रति स्नेह,
न्यायालय के प्रति मर्यादा,
मुवक्किल के प्रति ईमानदारी,
कानून के प्रति निष्ठा,
और निरंतर सीखने की विनम्रता।
कभी न्यायालय की आगे की पंक्तियों में खाली पड़ी कुर्सियां भी हमें अपनी जगह का एहसास कराती थीं…
आज यदि वही कुर्सियां हमें वरिष्ठों के सम्मान का भाव याद नहीं दिला पा रही हैं, तो शायद समस्या केवल कुर्सियों की नहीं, बल्कि हमारी बदलती हुई पेशेवर संस्कृति की है।
वकालत में आगे बढ़ना आवश्यक है, लेकिन आगे बढ़ते हुए यह भूलना उचित नहीं कि—
हम केवल एक पेशा नहीं कर रहे,
हम न्याय व्यवस्था का हिस्सा हैं।
और इस पेशे की असली पहचान केवल इस बात से नहीं होगी कि हमने कितने मुकदमे लड़े, कितने मुवक्किल बनाए या कितना बड़ा चैम्बर बनाया…
बल्कि इससे होगी कि हमने वकालत की मर्यादा को कितना बचाए रखा।
अनुज गुप्ता एडवोकेट फतेहगढ़













