कतारों में फंसा भारत: मंदिर, अस्पताल और प्राथमिकताओं का संकट संकट
आज के भारत की एक कड़वी और असुविधाजनक सच्चाई यह है कि देश के पवित्रतम मंदिरों से भी ज्यादा भीड़ अब अस्पतालों के बाहर दिखाई देती है। यह एक ऐसी दुखद समानता है, जो सरकारी और निजी स्वास्थ्य केंद्रों के बाहर सुबह-शाम ही नहीं, बल्कि अब चौबीसों घंटे देखी जा सकती है। मंदिर हो या अस्पताल, दोनों ही ऐसे स्थान हैं जहां कोई भी व्यक्ति खुशी-खुशी या स्वेच्छा से नहीं जाना चाहता। एक तरफ आस्था की लाचारी है, तो दूसरी तरफ जीवन बचाने की बेबसी। विडंबना देखिए कि कभी हमारे देश में मंदिरों के दर्शन सहज और सुलभ हुआ करते थे। परंतु, जब से व्यवस्थापकों और पुजारियों की जगह भारी-भरकम ट्रस्टों, शासन और प्रशासन ने संभाली है, तब से आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन एक कठिन आफत बन चुके हैं। सुरक्षा, वीआईपी संस्कृति और प्रबंधन के नाम पर आम आदमी को केवल लंबी और अंतहीन कतारें मिली हैं।
यही बदइंतजामी देश के शीर्ष स्वास्थ्य संस्थानों में भी पूरी नग्नता के साथ दिखाई देती है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों में प्रवेश से लेकर निकास तक जो मारामारी और अव्यवस्था मची है, वह रूह कंपा देने वाली है। वहां का दृश्य दिल दहला देता है, जहां गंभीर रूप से बीमार मरीज कतारों में रेंगने को मजबूर हैं। मरीज का तीमारदार नियमों को ताक पर रखकर बस इसलिए डॉक्टरों और काउंटरों के आसपास मंडराता रहता है कि कहीं उसका मरीज व्यवस्था की इस अंधी दौड़ में दम तोड़कर लाइन न तोड़ दे। यह डर काल्पनिक नहीं, बल्कि रोज की हकीकत है। सरकारी अस्पताल कहने को आधुनिक हो रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर वे आज भी पुराने ढर्रे के ‘सफाखाने’ ही बने हुए हैं, जहां स्वच्छता, संवेदनशीलता और त्वरित इलाज का भारी अभाव है।
दूसरी ओर, निजी अस्पतालों की स्थिति भी कोई आदर्श पेश नहीं करती। वहां की मारामारी का स्वरूप अलग है, जो व्यावसायिकता और दिखावे से ढका हुआ है। निजी अस्पतालों के पार्किंग स्थलों पर गाड़ियों के इंजन लगातार चालू रहते हैं, पेड़-पौधे और वातानुकूलित शमियाने या शेड लोगों से अटे पड़े हैं। वहां तीमारदार भारी भरकम फीस चुकाने के बाद भी इस मानसिक तनाव और तसल्ली के बीच झूलते रहते हैं कि कम से कम उनका मरीज वार्ड के भीतर सुरक्षित है। सरकारी तंत्र की विफलता का सीधा फायदा यह निजी क्षेत्र उठा रहा है, जहां स्वास्थ्य सेवा कम और व्यापार ज्यादा नजर आता है।
सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि देश के नीति-नियंताओं, शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इन हालातों की पूरी जानकारी है। वे स्वयं इन अव्यवस्थाओं से भली-भांति परिचित हैं। इसके बावजूद, आज तक ट्रेनों, मंदिरों और अस्पतालों में आम नागरिक को सम्मानजनक नंबर, पारदर्शी लाइन और एक न्यायसंगत आरक्षण या टोकन प्रक्रिया देने पर कोई गंभीर विचार-विमर्श तक नहीं किया गया। यह नीतिगत उदासीनता नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
यह असंतुलन केवल स्वास्थ्य और आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी संपूर्ण व्यवस्था में व्याप्त है। बुनियादी और प्राथमिक शिक्षा (बेसिक शिक्षा) से सरकारी सुविधाएं लगातार लोप हो रही हैं, स्कूल जर्जर हैं और शिक्षकों की कमी है। इसके विपरीत, शासन का पूरा जोर केवल उच्च शिक्षा की बड़ी-बड़ी इमारतों और संस्थानों पर है। जब नींव ही कमजोर होगी, तो उस पर खड़ी इमारत कितनी टिकाऊ होगी? प्राथमिक स्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा को नजरअंदाज करके देश को महाशक्ति बनाने का यह विरोधाभास आने वाले समय में भारतवर्ष में क्या गुल खिलाएगा, यह सोचकर भी डर लगता है। यदि समय रहते इन बुनियादी सुविधाओं में सुधार और कतारों में खड़े अंतिम व्यक्ति को राहत नहीं दी गई, तो आम आदमी की किस्मत और देश का भविष्य सचमुच ‘राम भरोसे’ ही रह जाएगा।















