एटा कचहरी में ‘सरकारी’ के नाम पर वसूली का खेल! बिना GST, बिना टेंडर नंबर… ठेकेदार काट रहे ₹20 की पर्ची, उठ रहे बड़े सवाल
एटा:
कचहरी परिसर में अपने काम से आने वाले आम लोगों की जेब पर डाका डाला जा रहा है या वाकई यह नियम के तहत हो रहा है? सोशल मीडिया पर वायरल हो रही पार्किंग पर्ची ने जिला प्रशासन और स्थानीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
‘मां गीता रिकवरी एजेंसी’ (ठेकेदार सर्वेश कुमार) के नाम से काटी जा रही इस पर्ची पर बड़े-बड़े अक्षरों में “सरकारी पार्किंग ठेका” लिखा हुआ है। लेकिन पर्ची की बनावट और उस पर लिखे विवरण को देखकर कोई भी समझदार व्यक्ति ठगा हुआ महसूस करेगा।
पर्ची की पोल खोलती ये 3 बड़ी खामियां:
‘सरकारी’ शब्द का खेल: पर्ची पर फर्जी या भ्रम फैलाने वाले अंदाज़ में “सरकारी” लिखा गया है, जबकि यह एक प्राइवेट एजेंसी का पर्ची पैड है। जनता को गुमराह करने के लिए क्या प्रशासन की आड़ ली जा रही है?
न GST नंबर, न टेंडर रजिस्ट्रेशन: किसी भी आधिकारिक सरकारी पर्ची या वैध ठेके पर GSTIN या जिला प्रशासन/नगर पालिका का टेंडर नंबर दर्ज होना अनिवार्य होता है। इस पर्ची से ऐसा कोई भी प्रामाणिक विवरण नदारद है।
मनमाना शुल्क (₹20 की वसूली): एटा जैसे जिलों और कचहरी परिसरों में दोपहिया वाहनों (जैसे HF Deluxe, UP 82 S 3080) के लिए आमतौर पर तय पार्किंग शुल्क ₹5 से ₹10 होता है। लेकिन पर्ची पर पेन से हाथ से ₹20 लिखे गए हैं—क्या यह सीधे-सीधे ओवरचार्जिंग और अवैध वसूली नहीं है?
जिला प्रशासन एटा और पुलिस से सीधे सवाल:
क्या ‘मां गीता रिकवरी एजेंसी’ को कचहरी में आधिकारिक पार्किंग संचालन का टेंडर मिला है?
यदि टेंडर स्वीकृत है, तो दोपहिया वाहन की सरकारी निर्धारित दर क्या है? क्या ₹20 वसूलने की इजाजत दी गई है?
बिना GST और बिना रजिस्ट्रेशन नंबर के रसीदें काटकर राजस्व को चूना लगाने की छूट किसने दी?
हमारी अपील:
एटा के जिम्मेदार अधिकारियों (SDM / ADM प्रशासन / कचहरी सुरक्षा प्रभारी) को इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए और पार्किंग स्थल पर आधिकारिक ‘रेट बोर्ड’ लगवाना चाहिए ताकि आम जनता से लूट बंद हो सके।
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