आज उस महान विभूति का जन्मदिन है जिन्होंने पूरी दुनिया को ‘गिनना’ सिखाया! आलेख किशोर भट्ट

आज उस महान विभूति का जन्मदिन है जिन्होंने पूरी दुनिया को ‘गिनना’ सिखाया!

विश्व को ‘शून्य’ (0) का उपहार देने वाले, प्राचीन भारत के महानतम गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

उन्होंने सदियों पहले बता दिया था कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है। आज का आधुनिक विज्ञान उनके सिद्धांतों का ऋणी है। भारत के इस गौरव को नमन करें!

 

महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट प्राचीन भारत के उन चमकते सितारों में से एक हैं, जिन्होंने दुनिया को यह सिखाया कि सितारों और संख्याओं को कैसे पढ़ा जाता है। वे गुप्त काल के दौरान सक्रिय थे, जिसे भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है।

यहाँ उनके जीवन और योगदान का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. संक्षिप्त परिचय

जन्म: 476 ईस्वी (कुसुमपुर/पाटलिपुत्र, वर्तमान पटना, बिहार)।

शिक्षा: माना जाता है कि उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी।

प्रमुख रचनाएँ: ‘आर्यभटीय’ और ‘आर्य-सिद्धांत’।

2. प्रमुख गणितीय योगदान

आर्यभट्ट ने गणित के क्षेत्र में ऐसी खोजें कीं जो उस समय के पश्चिमी विद्वानों की कल्पना से भी परे थीं:

शून्य (Zero) और स्थानीय मान: हालांकि शून्य के पीछे की अवधारणा पुरानी थी, लेकिन आर्यभट्ट ने दशमलव प्रणाली (Decimal System) और स्थान-मान पद्धति का उपयोग करके गणित को एक नया आधार दिया।

पाई (\pi) का सटीक मान: उन्होंने \pi का मान 3.1416 बताया, जो आधुनिक गणना के बहुत करीब है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक ‘आसन्न’ (approximate) मान है।

त्रिकोणमिति (Trigonometry): उन्होंने ‘ज्या’ (Sine) और ‘कोटिज्या’ (Cosine) की अवधारणाओं पर काम किया। आज का ‘Sine’ शब्द वास्तव में उनके ‘ज्या’ शब्द का ही लैटिन अनुवाद है।

बीजगणित (Algebra): उन्होंने द्विघात समीकरणों (Quadratic equations) और समानांतर श्रेणियों के योग को हल करने के सूत्र दिए।

3. खगोल विज्ञान (Astronomy) में क्रांति

जब दुनिया मानती थी कि पृथ्वी स्थिर है, तब आर्यभट्ट ने क्रांतिकारी सिद्धांत दिए:

पृथ्वी का घूमना: उन्होंने बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी (axis) पर घूमती है, जिसके कारण दिन और रात होते हैं।

तारों की गति: उन्होंने समझाया कि तारे चलते हुए प्रतीत होते हैं क्योंकि पृथ्वी घूम रही है (जैसे नाव में बैठे व्यक्ति को किनारे के पेड़ पीछे जाते दिखते हैं)।

ग्रहण का वैज्ञानिक कारण: उन्होंने उस समय के अंधविश्वासों (जैसे राहु-केतु) को खारिज किया और बताया कि चंद्र ग्रहण पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ने से और सूर्य ग्रहण चंद्रमा के पृथ्वी और सूर्य के बीच आने से होता है।

वर्ष की अवधि: उन्होंने गणना की कि एक वर्ष में 365.258 दिन होते हैं, जो आधुनिक गणना के बेहद करीब है।

4. उनके सम्मान में आधुनिक भारत

भारत ने अपने इस महान सपूत को कभी नहीं भुलाया:

आर्यभट्ट उपग्रह: 19 अप्रैल, 1975 को भारत ने अपना पहला कृत्रिम उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा, जिसका नाम ‘आर्यभट्ट’ रखा गया।

संस्थान: उनके सम्मान में ‘आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय’ (पटना) और ‘आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान’ (ARIES) की स्थापना की गई।

चंद्रमा पर गड्ढा (Crater): चंद्रमा पर स्थित एक क्रेटर का नाम उनके सम्मान में ‘आर्यभट्ट’ रखा गया है।

एक रोचक तथ्य: आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक ‘आर्यभटीय’ मात्र 23 वर्ष की आयु में लिखी थी। इसमें गणित और खगोल विज्ञान के 121 श्लोक हैं, जो गागर में सागर भरने जैसा काम करते हैं

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