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7 वर्षीय मासूम बालक मृत्युंजय की अद्भुत और सच्ची घटना किसी चमत्कार से कम नहीं है।   विलक्षण प्रतिभा , रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

7 वर्षीय मासूम बालक मृत्युंजय की अद्भुत और सच्ची घटना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

विलक्षण प्रतिभा

 

डिजिटल युग का नन्हा अभिमन्यु: मृत्युंजय

 

एक अनोखी शुरुआत

बाह। आगरा के बाह कस्बे के चित्रगुप्त नगर में रहने वाले देश दीपक नेहरू जी का सात साल का बेटा, मृत्युंजय, पहली नज़र में एक साधारण बच्चा लगता है। वह ग्लोबल स्कूल ऑफ साइंस में कक्षा एक का छात्र है। लेकिन उसका दिमाग और उसकी एकाग्रता किसी असाधारण महापुरुष जैसी है।

13जून 2026 की भीषण गर्मी में आगरा से कुछ पत्रकार एक धार्मिक कवरेज के सिलसिले में बाह आए हुए थे। वहां खेल रहे इस नन्हे बालक को जब उन्होंने मंच पर बुलाया, तो किसी ने नहीं सोचा था कि इतिहास रचने वाला है।

 

जब गूंजी कर्ण की हुंकार

मृत्युंजय ने माइक हाथ में लिया। अमूमन इस उम्र के बच्चे “नानी तेरी मोरनी” या बाल-गीत सुनाते हैं, लेकिन मृत्युंजय के होंठों से रावण द्वारा रचित, महाभारत के महायोद्धा कर्ण की महाकविता “वही कर्ण हूं मैं” फूट पड़ी।

उसकी आवाज़ में ऐसा ठहराव और शब्दों में ऐसी शुद्धता थी, मानो कोई मंझा हुआ रंगमंच का कलाकार बोल रहा हो। कविता पढ़ते हुए जब चार मिनट बीत गए, तो शिक्षकों ने उसे समय की कमी के कारण टोकने का प्रयास किया। लेकिन मृत्युंजय रुका नहीं। उसने बेहद मासूमियत मगर दृढ़ता से अपने नन्हे हाथ का संकेत किया, मानो कह रहा हो—”अभी रुकिए, मुझे पूरा करने दीजिए।” वह बिना विचलित हुए पूरी कविता सुनाता गया।

 

बिना पढ़े-लिखे कैसे हुआ यह चमत्कार?

वहां मौजूद सभी शिक्षक और लोग दंग रह गए। जो बच्चा अभी ठीक से हिंदी के बड़े शब्द पढ़ भी नहीं सकता, उसे इतनी लंबी और क्लिष्ट पंक्तियां कैसे याद हो गईं? जब मृत्युंजय से इसके पीछे का रहस्य पूछा गया, तो उसका जवाब किसी को भी सोच में डाल देने वाला था।

मृत्युंजय ने बताया कि जब वह यूकेजी (UKG) कक्षा में था, तब उसने अपने माता-पिता के मोबाइल में Spotify ऐप को खुद ही खोजना और चलाना सीख लिया था। बिना किसी की मदद के, उसने इस तकनीकी माध्यम से कविता को बार-बार सुना। उसकी अद्भुत एकाग्रता और ‘फोटोग्राफिक मेमोरी’ ने उन शब्दों को उसके दिलो-दिमाग पर हमेशा के लिए छाप दिया।

 

सम्मान और भविष्य की उड़ान

शिक्षकों ने मृत्युंजय की इस अजब और अविस्मरणीय प्रतिभा को खड़े होकर सलाम किया और उसे विशेष पुरस्कार (Prize) से नवाजा। 16 अक्टुबर 2019 को जन्मा यह बालक आज के डिजिटल युग का वह उदाहरण है, जो दिखाता है कि अगर तकनीक का सही दिशा में उपयोग हो, तो एक छोटा सा बच्चा भी कमाल कर सकता है। वह बिना पढ़े-लिखे भी सुनकर ज्ञान का समंदर समेट सकता है।

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