मंच पर खड़े होकर, मैं आज गवाही देता हूँ,
मैं अपनी कलम से, व्यवस्था को अर्जी देता हूँ।
न मैं कोई वक्ता हूँ, न कोई बड़ा शायर हूँ,
मैं तो केवल उन आवाज़ों का एक छोटा-सा कायल हूँ—
जो दब गईं फाइलों में, जो सड़ गईं गलियारों में,
जो कैद हैं अभी भी, हुक्मरानों के इशारों में।
मेरे नाम के साथ, ‘एके बिंदुसार’ जुड़ा है,
मत समझना यह नाम, सिर्फ कागज़ पर खड़ा है!
यह नाम नहीं है मेरा, यह जलती हुई एक मशाल है,
हर उस पत्रकार का, जो आज भी बेहाल है।
सत्ता की मेज पर, जो बिकने से इंकार करते हैं,
हम उन कलमकारों का, इस्तकबाल करते हैं।
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सुनो!
जब स्याही सूख जाती है, तब लहू काम आता है,
क्रांति का बीज अक्सर, श्मशान में ही उग आता है।
पत्रकारिता का धर्म, सिर्फ खबरें पढ़ना नहीं होता,
भीड़ में खड़ा होकर, बस रफू करना नहीं होता।
क्रांति का अर्थ है—सच के लिए, सीना अड़ा देना,
गलत के आगे, अपनी ‘ना’ को पहाड़ बना देना।
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तो सुनो ऐ हुक्मरानों, मेरी कलम अभी जिंदा है,
मेरे शब्दों के हर लफ्ज़ में, एक आंधी का परिंदा है।
मैं लिखूँगा, मैं गढ़ूँगा, मैं इतिहास बदलूँगा,
मैं बिंदुसार हूँ, मैं ही क्रांति की नई राह चलूँगा!
क्योंकि अभी बहुत कुछ लिखना बाकी है!






