सबसे पहले लेवर् एक्ट से मुक्ति मिले  पत्रकार एक्ट बने  शंकर देव तिवारी 

सबसे पहले लेवर् एक्ट से मुक्ति मिले

पत्रकार एक्ट बने

शंकर देव तिवारी

आखिर कार वह एक बात हम क्यों भूल जाते हैं कि हम सड़क पर जब आए थे तब हम लावारिश थे। आज हम अडतीश साल में अपना लावारिस पन भी नही दूर कर सके हैं। उस समय केवल यही मांग थी कि हमारी शिनाख्त पत्रकार के रूप में हो किसी ख़बर को कवरेज करने दोरान हुए हादसे में मारे जाने के बाद।

वही हुआ भी, तत्कालीन मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव और राज्य पाल मोती लाल बौरा ने सुविधा विहीन जिले से प्रकाशित समाचार पत्र के पत्रकार को तहसील प्रतिनिधि की मान्यता की घोषणा की थी। वहीं वाराणसी के सम्मेलन में एक आई ए इस योगेंद्र नारायण सिंह ने जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अद्धयक्षता में ग्रा प ए के एक सदस्य को आमन्त्रित सदस्य बनाने की घोषणा की थी।

सुविधा विहीन शब्द हम आज तक हटाके सुविधा नहीं ले पाए

वहीं अन्य बात जो हम पत्रकार की बदलती तश्वीर सरकार की नजर में हम मान्यता श्रेणी से भी बदतर हालत में पहुँच चुके हैं।

केवल श्रम विभाग की नियमावली के अनुसार ही लेवर् एक्ट के तहत कर्मचारी हैं। हम किसी भी क्षेत्र में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने के बाद भी हमारे संगठनों की मांग के विपरीत मात्र कर्मचारी हैं। आज तक पत्रकार एक्ट नहीं है।हमारे लिए सुरक्षा रक्षा कानून नहीं है। पत्रकार का फंड जो कटता था वह भी नहीं बन्द कर दिया गया है।

 

ग्रामीण पत्रकारिता को मुख्यधारा में वो पहचान और सुरक्षा नहीं मिली है, जिसकी वे हकदार हैं। चूंकि पत्रकार शब्द किसी एक वैधानिक ढांचे में नहीं बंधा, इसलिए ग्रामीण पत्रकारों की श्रेणी “समाज के सजग प्रहरी और अनौपचारिक सूचना तंत्र” की होती है, जो बिना किसी प्रशासनिक सुविधा के धरातल की सच्चाई सामने लाते हैं।

गुमनाम नायक – ग्रामीण पत्रकार और उनका वजूदपत्रकारिता का कैनवस बेहद विस्तृत है। अक्सर जब हम ‘पत्रकार’ शब्द का उपयोग करते हैं, तो हमारे जेहन में महानगरों के वातानुकूलित स्टूडियो या प्रेस रूम की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस परिभाषा से परे, एक विशाल दुनिया ग्रामीण पत्रकारिता की है। सवाल यह उठता है कि जब पत्रकारिता स्वयं किसी एक निश्चित वैधानिक परिभाषा या फ्रेमवर्क का स्पष्ट अंग नहीं है, तो ग्रामीण पत्रकार की श्रेणी क्या होगी?धरातल की आवाज और सामाजिक प्रहरीग्रामीण पत्रकार किसी मान्यता प्राप्त श्रेणी या वेतन आयोग के दायरे में नहीं आते। उन्हें किसी कॉर्पोरेट मीडिया हाउस की सुरक्षा प्राप्त नहीं होती। वे राज्य की कल्याणकारी योजनाओं और ग्रामीण भारत के बीच की सबसे पहली और मजबूत कड़ी होते हैं। ऐसे में उनकी श्रेणी एक ‘स्वतंत्र सामाजिक प्रहरी’ की है। वे उस नींव की ईंट की तरह हैं, जो गांव की समस्याओं, भ्रष्टाचार, और स्थानीय संस्कृति को राष्ट्रीय पटल तक पहुंचाते हैं।मूल्यांकन और पहचान का संकटकानूनी और प्रशासनिक रूप से उन्हें अक्सर ‘स्ट्रिंगर’ या ‘प्रतिनिधि’ मान लिया जाता है, जिसके कारण उन्हें स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, या उचित पारिश्रमिक जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है। यह व्यवस्था की एक बड़ी विफलता है कि जो व्यक्ति पंचायत से लेकर ब्लॉक स्तर तक की खबरों को निष्पक्षता से जनता तक पहुंचा रहा है, उसका अपना भविष्य अनिश्चितताओं के भंवर में . केवल ‘सूचना देने वाले’ नहीं हैं, बल्कि वे ग्रामीण लोकतंत्र के सजग सिपाही हैं। आवश्यकता इस बात की है कि ग्रामीण पत्रकारों को एक निश्चित पहचान दी जाए, ताकि उन्हें मुख्यधारा के समकक्ष सम्मान और सुरक्षा मिल सके। उन्हें किसी तय ढांचे में बांधने के बजाय, उनकी उपयोगिता और जोखिम के आधार पर मान्यता और संरक्षण दिया जाना चाहिए।देश के चौथे स्तंभ को मजबूत करना है, तो हमें सबसे पहले इस ग्रामीण नींव को सशक्त और सुरक्षित बनाना होगा।यही मांग ग्रा प ए को लेकर चलना होगा अभी से जो दिवा स्वप्न हम संगठन के बढ़ते बल के बल देखने लगे हैं पर विचार करना होगा।

 

विगत दिवस दिल्ली में सम्पन्न ग्रामीण पत्रकार एसो सिएशन की राष्ट्रीय कार्य समिति की बैठक में मेरा प्रस्ताव रहा जिसमें संगठन को कैसे मजबूत करें विकसित करें पर ही चर्चा न हो इसके अलावा हम लेवर् एक्ट से कैसे मुक्त हो पत्रकार एक्ट में आए जिस एक्ट को बनाने की मांग करना चाहिए के बारे में प्रस्ताव मेरी और से रहा…….

 

 

लेखक ग्रामीण पत्रकार

Leave a Comment