सच दिखाने की सज़ा? भ्रष्टाचार की खबर उजागर करने वाले पत्रकार के घर आधी रात को पहुंची मद्यनिषेध पुलिस; खाली हाथ लौटना पड़ा

वैशाली (बिहार)।लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया को डराने और उसकी आवाज़ को दबाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। वैशाली जिला अधिकारी (DM) कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार की खबर प्रमुखता से उजागर करने वाले एक स्थानीय पत्रकार को उस वक्त प्रशासनिक कोपभाजन का शिकार होना पड़ा, जब आधी रात को मद्यनिषेध विभाग की पुलिस अचानक उनके घर धमक गई।
आरोप है कि पुलिस पत्रकार को शराब पीने और रखने के झूठे आरोप में गिरफ्तार करने की नीयत से आई थी। हालांकि, पत्रकार द्वारा शराब न पीने और घर से कुछ भी संदिग्ध न मिलने के कारण पुलिस टीम को बेरंग और खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
क्या है पूरा मामला
मिली जानकारी के अनुसार, पीड़ित पत्रकार ने हाल ही में वैशाली डीएम कार्यालय में चल रहे भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर एक खोजी रिपोर्ट दिखाई थी। इस खबर के चलते स्थानीय प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की काफी फजीहत हो रही थी। पत्रकार का आरोप है कि इसी बौखलाहट में उन्हें चुप कराने और सबक सिखाने के उद्देश्य से सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया।
खबर चलने के कुछ ही समय बाद, मद्यनिषेध पुलिस की एक टीम ने बिना किसी पुख्ता वारंट या ठोस आधार के, रात के अंधेरे में पत्रकार के आवास पर छापेमारी कर दी। पुलिस का इरादा पत्रकार पर शराबबंदी कानून के उल्लंघन का आरोप लगाकर उन्हें सलाखों के पीछे भेजने का था। लेकिन जांच में पत्रकार पूरी तरह पाक-साफ निकले, जिससे पुलिस की यह कथित ‘योजना’ पूरी तरह फ्लॉप हो गई।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान का सीधा उल्लंघन
इस घटना ने एक बार फिर बिहार में कानून के नाम पर प्रशासनिक तानाशाही और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
*घर में घुसकर चेकिंग* सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिर्फ एक खबर दिखाने की वजह से किसी नागरिक या पत्रकार के निजी जीवन में इस तरह दखल दिया जा सकता है?
*दबाव की राजनीति* यदि पत्रकार वाकई शराब का आदी होता, तो आज वह जेल में होता और भ्रष्टाचार की वह खबर हमेशा के लिए दब जाती। यह सीधे तौर पर सच को दबाने और डराने की कोशिश है।
*वैश्विक मंच पर भारत की गिरती साख का मुख्य कारण*
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में भारत का स्थान *157वें नंबर* के आसपास बना हुआ है। वैशाली की यह घटना साफ करती है कि आखिर क्यों भारत में पत्रकारिता का स्तर और उसकी सुरक्षा इतनी बदतर हो चुकी है।
जब भी कोई पत्रकार सच दिखाने या सरकारी तंत्र की कमियों को उजागर करने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ तुरंत मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है या उसे किसी अन्य मामले में फंसाने की साजिश रची जाती है। इस पूरे परिदृश्य में कहीं न कहीं सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों की मानसिकता पूरी तरह जिम्मेदार है।
*बड़ा सवाल* यदि तंत्र निष्पक्ष है, तो पहले उन विभागों और अधिकारियों की जांच क्यों नहीं होती, जिन पर खुद भ्रष्टाचार और शराबबंदी के नियमों को ताक पर रखने के गंभीर आरोप लगते रहते हैं?
*पत्रकार सुरक्षा कानून’ समय की मांग*
इस घटना के बाद स्थानीय पत्रकारों और बुद्धिजीवियों में भारी आक्रोश है। मांग की जा रही है कि देश और राज्य में *पत्रकार सुरक्षा कानून* को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि सच की आवाज़ बुलंद करने वालों को सरकारी तंत्र के इस ‘टॉर्चर’ से बचाया जा सके। यदि सरकारें वाकई लोकतंत्र की रक्षा करना चाहती हैं, तो उन्हें चाटुकारिता को बढ़ावा देने के बजाय सच का सामना करने का हौसला दिखाना होगा।









