सरज़मीं-ए- एटा … यह सिर्फ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि तहज़ीब, मोहब्बत और गंगा-जमुनी संस्कृति की जीती-जागती मिसाल है, आलेख निशा कांत शर्मा एडवोकेट

सरज़मीं-ए- एटा … यह सिर्फ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि तहज़ीब, मोहब्बत और गंगा-जमुनी संस्कृति की जीती-जागती मिसाल है। इसी मिट्टी ने ऐसे कई सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने इंसानियत को मज़हब से ऊपर रखकर समाज को जोड़ने का काम किया। उन नामों में एक नाम बड़े अदब और एहतराम के साथ लिया जाता है मौ शहीम उर्फ इश्शन खान का।

आज तीस जून है,उनका जन्मदिन है और यह दिन सिर्फ एक शख्सियत की सालगिरह नहीं, बल्कि उस सोच का जश्न है, जो नफरतों के अंधेरे में भी मोहब्बत के दिए जलाने का हौसला रखती है।

 

मौ शहीम उर्फ इश्शन खान सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता का चेहरा नहीं रहे, बल्कि एटा की आवाज़, दर्द और उम्मीदों के तरजुमान बने। उन्होंने हमेशा यह साबित किया कि असली सामाजिक कार्यकर्ता वो होती है, जो दिलों को जोड़ता है, न कि उन्हें बांटता है। जब-जब समाज में दरारें डालने की कोशिश हुई, तब-तब उन्होंने मजबूती से खड़े होकर एकता का पैगाम दिया।

वो कहते हैं कि धर्म इंसानियत सिखाता है, धर्म का इस्तेमाल कभी नफरत फैलाने के लिए नहीं करना चाहिए, बल्कि इंसानियत को मजबूत करने के लिए धर्म प्रेरित करता है। उन्होंने मंदिर और मस्जिद के बीच की दूरी को कम करने की कोशिश की, और लोगों को यह एहसास दिलाया कि असली पहचान इंसान होने की है, न कि सिर्फ किसी एक मज़हब से जुड़ी हुई।

एटा की गलियों में, चाय की दुकानों पर, शिक्षण संस्थानों में, हर एक स्थान पर आज भी उनकी सादगी, उनकी मिलनसारिता और उनके जज़्बे के किस्से सुनाई देते हैं। वो सामाजिक कार्यकर्ता कम, अपने लोगों के बीच एक अपनापन रखने वाले इंसान ज्यादा रहे। किसी के दुख में कंधा देना हो या किसी की खुशी में शामिल होना—उन्होंने हर मौके पर खुद को लोगों के करीब पाया।

आज जब समाज कई तरह की चुनौतियों से गुजर रहा है, तब मौ शहीम उर्फ इश्शन खान जैसे नेताओं की सोच और भी ज्यादा मायने रखती है। उनकी जिंदगी हमें यह सिखाती है कि सच्ची ताकत एकता में है, और मोहब्बत से बड़ी कोई राजनीति नहीं होती।

उनके जन्मदिन के इस खास मौके पर यही दुआ है कि अल्लाह उन्हें लंबी उम्र, अच्छी सेहत और वही जज़्बा अता करे, जिससे वो हमेशा समाज में अमन और भाईचारे का परचम लहराते रहें।

जनाब मौ शहीम उर्फ इश्शन खान साहब, लेखक/स्तम्भकार, सीनियर जर्नलिस्ट हैं।

आप सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक सोच हैं…

एक ऐसी सोच, जो एटा की मिट्टी में हमेशा ज़िंदा रहेगी।

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