WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.48 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50 PM

छुट्टियों में भी स्कूल फीस वसूली पर देशभर में उठे सवाल, अभिभावकों में बढ़ा आक्रोश; शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर छिड़ी बड़ी बहस, रिपोर्ट मुहम्मद इरफ़ान एडवोकेट

छुट्टियों में भी स्कूल फीस वसूली पर देशभर में उठे सवाल, अभिभावकों में बढ़ा आक्रोश; शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर छिड़ी बड़ी बहस

 

एटा।। देशभर में निजी स्कूलों की फीस व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। गर्मी की छुट्टियां, सर्दी का अवकाश, त्योहारों की छुट्टियां और अन्य अवकाश के दौरान भी विद्यार्थियों से नियमित मासिक फीस वसूले जाने को लेकर अभिभावकों के बीच असंतोष लगातार बढ़ रहा है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक लाखों परिवार इस सवाल को उठा रहे हैं कि जब छुट्टियों के दौरान बच्चे स्कूल नहीं जाते, नियमित कक्षाएं संचालित नहीं होतीं और कई सुविधाओं का उपयोग भी नहीं हो पाता, तो फिर स्कूलों द्वारा पूरी फीस लेने का आधार क्या है।शिक्षा के बढ़ते खर्च और आर्थिक दबाव के बीच यह मुद्दा अब केवल फीस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर रहा है। बड़ी संख्या में अभिभावकों का कहना है कि वर्तमान समय में बच्चों की शिक्षा पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। मासिक फीस के अलावा एडमिशन फीस, वार्षिक शुल्क, विकास शुल्क, कंप्यूटर शुल्क, स्मार्ट क्लास शुल्क, गतिविधि शुल्क, परीक्षा शुल्क और परिवहन शुल्क जैसे कई अलग-अलग मदों में शुल्क लिया जाता है। ऐसे में छुट्टियों के दौरान भी फीस जमा करने का दबाव मध्यमवर्गीय और नौकरीपेशा परिवारों के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है।कई अभिभावकों का कहना है कि एक परिवार में यदि दो या तीन बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हों, तो छुट्टियों के महीनों में भी फीस जमा करना आर्थिक संतुलन बिगाड़ देता है। अभिभावकों का तर्क है कि जब बच्चों को स्कूल की दैनिक शैक्षणिक सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तब कम से कम कुछ शुल्कों में राहत या स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। उनका कहना है कि शिक्षा बच्चों का अधिकार है, लेकिन लगातार बढ़ती फीस ने इसे आम परिवारों के लिए चिंता का विषय बना दिया है।दूसरी ओर निजी स्कूल प्रबंधन का पक्ष इससे अलग है।स्कूल संचालकों का कहना है कि फीस केवल कक्षा में पढ़ाई के दिनों का भुगतान नहीं होती, बल्कि पूरे शैक्षणिक सत्र के संचालन का वित्तीय आधार होती है। स्कूलों के अनुसार शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन, भवन किराया या रखरखाव, बिजली-पानी, सुरक्षा व्यवस्था, सफाई, तकनीकी संसाधन, प्रशासनिक खर्च और अन्य स्थायी खर्च छुट्टियों के दौरान भी जारी रहते हैं। इसी वजह से पूरे वर्ष के खर्च को 12 महीनों में विभाजित कर फीस निर्धारित की जाती है।शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों का संचालन निश्चित रूप से निरंतर आर्थिक संसाधनों पर निर्भर करता है, लेकिन इसके साथ फीस व्यवस्था में पूरी पारदर्शिता होना भी उतना ही आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि विवाद तब पैदा होता है जब अभिभावकों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती कि उनसे किस मद में कितना शुल्क लिया जा रहा है और छुट्टियों के दौरान किन सेवाओं के लिए भुगतान लिया जा रहा है। यदि स्कूल फीस का पूरा ब्रेकअप अभिभावकों के सामने रखें, तो इस प्रकार के विवाद काफी हद तक कम हो सकते हैं।देश के कई राज्यों में निजी स्कूलों की फीस नियंत्रण को लेकर नियम और कानून लागू हैं, लेकिन अभिभावकों का आरोप है कि कई स्थानों पर इन नियमों का प्रभावी पालन नहीं हो पा रहा है। कई अभिभावक संगठन लगातार यह मांग उठा रहे हैं कि स्कूल फीस निर्धारण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाए और किसी भी प्रकार की फीस वृद्धि या अतिरिक्त शुल्क लेने से पहले अभिभावकों को स्पष्ट जानकारी दी जाए।सामाजिक संगठनों और शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि शिक्षा केवल एक व्यावसायिक सेवा नहीं, बल्कि समाज निर्माण की आधारशिला है। इसलिए स्कूलों को आर्थिक व्यवस्थाओं के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। छुट्टियों में फीस वसूली को लेकर यदि अभिभावकों में असंतोष है, तो संवाद और पारदर्शिता के माध्यम से उसका समाधान निकालना जरूरी है।ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के अभिभावकों का कहना है कि बढ़ती महंगाई, रोजगार की अनिश्चितता और घरेलू खर्चों के बीच बच्चों की शिक्षा पहले ही एक बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसे में छुट्टियों के दौरान भी फीस जमा करने की अनिवार्यता परिवारों पर अतिरिक्त दबाव डालती है। कई परिवारों को फीस जमा करने के लिए उधार तक लेना पड़ता है।अब यह मुद्दा केवल एक स्कूल या एक शहर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर में शिक्षा व्यवस्था के आर्थिक ढांचे पर व्यापक चर्चा का विषय बन चुका है। अभिभावकों ने सरकार, शिक्षा विभाग और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं से मांग की है कि निजी स्कूलों की फीस व्यवस्था को लेकर स्पष्ट और प्रभावी दिशा-निर्देश लागू किए जाएं, ताकि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़े और अभिभावकों का विश्वास मजबूत हो सके। आने वाले समय में यह मुद्दा शिक्षा नीति और निजी स्कूल प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

Ronda Faulk
Author: Ronda Faulk

Leave a Comment