ममता बनर्जी की केवल एक हार से उनकी पार्टी का बंटाधार हो गया है। सीधा कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग दल बनाकर मान्यता के लिए लोकसभा अध्यक्ष को अर्जी दी है। बाकी 1 या 2 को छोड़कर अन्य भी लाइन में है। इसके साथ ही 20 सांसदों ने एनडीए में शामिल होने की घोषणा कर दी है।
इससे नरेंद्र मोदी सरकार पर;
1.चंद्रबाबू नायडू का प्रेशर खत्म हुआ।
2.नीतीश कुमार का जो बचा खुचा प्रेशर था वो भी खत्म।
वर्ष 2024 के चुनाव में मेंने एक लेख लिखा था जो फेसबुक ही नही बल्कि ट्विट्टर व्हाट्सएप्प पर काफी ज्यादा वायरल हुआ था, जिसमे मेने बताया था कि सपा मुस्लिम को आश्वासन दे रही है कि बस एक दो साल में सरकार गिर जाएगी, फिर हम बना लेंगे, जबकिं नरेंद्र मोदी सरकार पूरे पाँच साल चलेगी। क्यों चलेगी। पूरा ब्यौरा दिया था। जिसमे ममता व केजरीवाल के सांसदों का भी जिक्र था। नरेंद्र मोदी के स्वतंत्र रूप से जो 32 कम सांसद है। उनकी पूर्ति आराम से कर लेंगे और धीरे धीरे कर भी ली। इस पूर्ति से;
1.ममता बनर्जी की पार्टी के 20 सासंद पूरे कर रहे है।
2.केजरीवाल की पार्टी के सांसद राज्यसभा में पूर्ति कर रहे है।
दोनो ही पार्टियो को;
“बंगाल व नई दिल्ली में मुस्लिम ने 90% से ऊपर वोट दिया”
अब इस वोट का मजा भाजपा लेगी। इनडायरेक्ट ही सही लेकिन लेगी।
अब;
1.ममता बनर्जी की एक हार से पार्टी खत्म होने के कगार पर कुछ समय बाद दिखेगी।
2.केजरीवाल की पार्टी भी एक तरह से नई दिल्ली में खत्म है। जिस दिन आप पार्टी में भागवत मान ने अलग गुट बना दिया, पंजाब में भी खत्म हो जाएगी।
अब हम इस स्तिथी में बसपा की तरफ ध्यान लाते है।
बहनजी 2012 से लगातार हार रही है। हर चुनाव हार रही है। 1 शीट तक पर आ गयी। लोकसभा में शून्य हो गई। लेकिन;
“पार्टी अभी भी मजबूती के साथ खड़ी है। नींव मजबूत है। टूटने की नौबत कभी नही आई। एक बार भी 2012 के बाद किसी ने बसपा के टूटने की आवाज तक नही सुनी”
कारण?
“बहनजी की योग्यता। कुशलता। अनुभव। व जब देखा कि इस समय हालात पक्ष में नही है। चुप रहो। लेकिन अपना कैडर, नींव बचाकर रखो”
इसलिए;..”
“चुनाव कोई से भी हो। डर बसपा का रहता है क्योंकि पता है कि हाथी कभी भी उठकर जंगल में तहस नहस मचा सकता है”
जबकिं;
“ममता बनर्जी व केजरीवाल को उधोगपतियों ने भर भरकर बॉन्ड के माध्यम से पैसा दिया। इतना दिया कि बसपा के चुनाव खर्च से कई गुणा ज्यादा ममता व केजरीवाल को मिला। फिर भी एक हार से ही दोनो का अस्तित्व संकट में आ गया”
जबकिं हम 5 से 6 चुनाव 2012 के बाद हार चुके है। हर हार के बाद भी अस्तित्व बरकरार रखा। आप राजनीति को जितना आसान समझते है, उससे कई गुणा ज्यादा टेढ़ी है। आजकल के नौशिखिया एससी युवा जो अभी अभी निक्कर से पेंट में आये है, वो सोचते है कि कुर्ता पजामा पहना बाहर निकले, भारत की जनता उनके सत्कार के लिए खड़ी है। सन्गठन चलाना कोई आसान काम नही है और उसमे भी अस्तित्व बचाकर रखना।
समझे?
विकास कुमार जाटव









